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2:00 pm
डॉ. महेश परिमल
भाषा अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसके बिना एक समाज की कल्पना करना ही मुश्किल है। भाषा ही हमारे जीेवन को सँवारती है। भाषा हमें जीने का आधार देती है। हिंदी के बारे में यही कहा जा सकता है कि यह इतनी सरल और सहज भाषा है कि थोड़े से प्रयास से इसे कोई भी अहिंदीभाषी भी सीख सकता है। आज यह करोड़ों लोगों की भाषा बनी हुई है। इसके पीछे यही है कि यह अन्य भाषाओं के शब्दों को ग्रहण करने में संकोच नहीं करती। एक भाषा में यदि दूसरी भाषा के शब्दों का आगमन होता है, तो उससे भाषा समृद्ध होती है। जिन भाषाओं ने प्रगति की है, उन सभी भाषाओं ने दूसरी भाषा के शब्दों को ग्रहण करने में संकोच नहीं किया है। हम अँगरेजी की बात करें, तो आज उस भाषा में हिंदी के करीब 2500 शब्दों का समावेश किया गया है। इसी तरह हिंदी में भी अन्य भाषाओें के शब्दों को लिया गया है, इसलिए यह भाषा इतनी सहज और सरल बन पाई है।
हम बरसाें से हिंदी भाषा का प्रयोग बातचीत और लेखन में कर रहे हैं। अब तो यह भाषा हममें रच-बस गई है। इस भाषा में जब हम अपने विचारों की अभिव्यक्ति देते हैं, तो हमें पता ही नहीं चलता कि इसमें न जाने कितने ही शब्द हिंदी के न होकर किसी अन्य भाषा के हैं। हम एक इमारत बनाते हैं, तो यह आवश्यक नहीं कि उसके लिए प्रयुक्त सारी सामग्री हमें उसी शहर में मिल जाए। कई बार कई चीजें हमें दूसरे शहर से लानी होती है। ठीक इसी तरह एक भाषा तभी सुदृढ़ बनती है, जब उसमें अन्य भाषाओं के शब्दों का समावेश किया जाए। इसलिए हम दावे से यह कह सकते हैं कि हिंदी में अन्य भाषाओं के शब्दों का समावेश होने के कारण यह भाषा आज करोड़ों लोगों द्वारा व्यवहृत की जा रही है। हिंदी भाषा के लिए इसे आशीर्वाद ही माना जाएगा कि इसने बहुत ही सहजता के साथ अन्य भाषाओं के शब्दों को ग्रहण किया है।
अब हम चर्चा करें उन शब्दों की, जो हिंदी के नहीं हैं, पर एक निरक्षर ग्रामीण भी उसका अर्थ समझता है। हम ‘कफ़न’ को ही ले लें, इसका अर्थ आज हर कोई समझता है। पर यदि हम इसके बजाए हिंदी का शब्द ‘मृतचैल’ कहेंगे, तो ग्रामीण ही नहीं, एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी इसे नहीं समझ पाएगा। ‘पाव’ शब्द पुर्तगाली है, जो िहंदी में आसानी से घुल-मिल गया है। आज इससे पाव रोटी, पाव वड़ा, पाव भाजी जैसे शब्द बने। इसका प्रयोग हर कोई अपनी भाषा में कर रहा है। ‘चर्चा’ शब्द उर्दू का है, जिसे पुलिंग के रूप में इस्तेमाल में लाया जाता है, हिंदी ने इस शब्द को स्त्रीलिंग के रूप में शामिल किया। भाषा जितनी अधिक लचीली होगी, उतनी ही समृद्ध भी। पानी के तेज बहाव में वही वनस्पति या पेड़ अधिक समय तक बने रहते हैं, जो झुकना जानते हैं। अकड़ हर किसी के लिए खतरनाक होती है। इसलिए भाषा के संबंध में भी यही कहा जाता है कि लचीली भाषा अधिक समय तक जीवित रहती है। इस मामले में अँगरेज़ी की मिसाल दी जाती है, जिसने दुनियाभर की भाषाओं से शब्द अपनाए हैं। दर्शन, अध्यात्म के मामले में उसने कई भारतीय शब्द लिए हैं। जैसे- गुरु, पंडित, योग, आँचल, जंगल आदि। जो चीजें विदेशी परिवेश से आई हैं, उनके लिए विदेशी शब्द ले लेना एकबारगी ठीक भी है, लेकिन सरल, सहज और प्रचलित हिंदी शब्दों की जगह अँगरेज़ी का इस्तेमाल गलत है। हिंदी ने भी फ़ारसी, अरबी, फ्रेंच, पुर्तगाली, रूसी, न जाने कितनी ही भाषाओं से शब्द लिए हैं। लेकिन यह लेन-देन स्वाभाविक और आवश्यक रहा है। हिंदी फिल्मों के नाम आज अँगरेज़ी शब्दों में लिखे जा रहे हैं-जैसे 'वेकअप सिड', 'जब वी मैट', 'वेलकम टू सज्जनपुर', 'थ्री इडिएट्स', 'गॉड तुसी ग्रेट हो' आदि। ये फिल्में खूब चली हैं और हिंदीभाषी जनता ने उन्हें खूब देखा भी है, तो इसका मतलब क्या लगाया जाए? यही कि जनता ने इसे, अपने आप सहज ही या मजबूरी में स्वीकार कर लिया है।

आज चिकित्सक के स्थान पर वैद्य लिखने के आग्रही हम नहीं हैं, क्योंकि हिन्दी परिवेश में वैद्य शब्द के साथ एक अलग व्यंजना जुड़ गई है मसलन देशी पद्धति से इलाज करनेवाला। आधुनिक चिकित्सा पद्धति के संदर्भ में डॉक्टर शब्द सर्वमान्य हो चुका है। अब इसे हिन्दी कोशों में जगह दी जानी चाहिए। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी हर साल प्रचलन के आधार पर अँगरेज़ी में समाते जा रहे अन्य भाषाओं के शब्दों को अँगरेज़ी भाषा में स्वीकार्य शब्दों के तौर पर शामिल करती है। बैंक, सैलरी, फंड, टीवी, जींस, पेंट, टी-शर्ट, जैसे दर्जनों शब्दों को हिन्दी कोशों में स्वीकार्य शब्द के तौर पर स्थान दिया जाना चाहिए, तभी हम शुद्धतावादियों के दुराग्रह से भी बच पाएँगे। देश में संचार माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के चलते संस्कृतियों के बीच अंतर्संबंध बढ़ने लगा है। आज मुंबइया शैली की हिन्दी भी सामने आई है। इस शैली के अनेक शब्दों की व्यंजना निराली है। फंटूश, बिंदास, फंडा, फंडू, भिड़ू, बीड़ू जैसे शब्द भी इसी कतार में आते हैं।
मेरा मानना है कि हिंदी की समृद्धि के लिए हमें अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। आखिर वे भी इसी मिट्टी की भाषाएँ हैं। इससे आपकी अभिव्यक्ति और अधिक निखरेगी। हम अपनी बात को पूरी शिद्दत के साथ रख पाएँगे। भाषाएँ जनता की सम्पत्ति है, उन्हें सुरक्षित रखना अनिवार्य है। हम अकेले व्यवस्था को नहीं बदल सकते, लेकिन हम अपने घर पर, दुकान पर, अपने समाज में, मित्रमंडली में अपनी भाषा और उसके अधिकाधिक शब्दों का प्रयोग तो कर ही सकते हैं। हम घर पर अपने बच्चों को मातृभाषा तो सिखा ही सकते हैं। हम स्वयं अपनी भाषा को सुरक्षित तो रख ही सकते हैं। आज हम ढोकला, खाखरा, थेपला आदि गुजराती व्यंजन दक्षिण भारत में भी खा सकते हैं। इडली-डोसा भी देश के कोने-कोने में मिल जाता है। पंजाब के छोले-भटूरे, छोले-कुलचे भी आज हर जगह मिल जाते हैं। जब हम व्यंजन के मामले में इतने दुराग्रही नहीं हैं, तो फिर भाषा के मामले में क्यों होना चाहिए?
डॉ. महेश परिमल

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