सोमवार, 18 मई 2015

अमेरिका जैसा मैंने देखा-भाग 2


डॉ. महेश परिमल
न्यूयार्क एयरपोर्ट पर उतरने के पहले पायलट की आवाज विमान में गूँजी। अबूधाबी एयरपोर्ट पर आप सभी का स्वागत है। यह सुनकर लोग हँसने लगे। इसके बाद पायलट ने तुरंत अपनी गलती सुधारते हुए माफी मांगी और कहा कि न्यूयार्क एयरपोर्ट पर आपका स्वागत है। मेरे लिए एकदम नया अनुभव। मेरा सामान कहाँ होगा? किस हालत में होगा? कहाँ मिलेगा? इसी चिंता में विमान से बाहर आया। सभी यात्रियों के साथ-साथ चलता हुआ मैं उस स्थान पर पहुँचा, जहाँ एक गोल घेरे में सबका सामान आ-जा रहा था। मैंने ध्यान से देखा कि एक स्थान पर हमारे ही विमान का अगला भाग है, जहाँ से सामान बाहर निकल रहा है और सीधे उस स्थान पर गिर रहा है, जो एक गोल घेरे में है। यात्री उसके चारों तरफ खड़े हैं, जिसका सामान है, वह अपने सामान को पहचान कर उठा लेता। अगर गलत सामान उठाया है, तो फिर उसी स्थान पर रख देता है। यदि किसी के दो बेग हैं, तो आवश्यक नहीं कि दोनों साथ-साथ आएँ। एक बेग मिलने के बाद दूसरा बेग कुछ देर बाद भी मिल सकता है। मेरा ध्यान अपने बेग की ओर था कि पीछे से किसी ने मेरी पीठ पर हाथ रखते हुए कहा-आखिर आ गए डॉक्टर! मैंने पीछे देखा, तो मेरा मित्र भूपिंदर मेरे सामने था। उसने मुझे भींच लिया, कहो डॉक्टर कैसे हो? मैंने कहा-मैंनू तो चंगा है प्राजी, तुस्सी सुनाओ,  कैसे हो? मैंने भी उसे गले लगाते हुए कहा-प्राजी तुम्हारी जिद थी कि डॉक्टर को अमेरिका आने से कोई रोक नहीं सकता, देखो मैं तुम्हारे सामने हूँ। इसके बाद मैं उनकी पत्नी सुखविंदर से मिला। उनकी बेटी अर्पण को गोद में लिया। भूप्पी ने तुरंत कुछ तस्वीरें लीं। उसके बाद एक विदेशी यात्री से अनुरोध किया कि हम चारों की तस्वीर हमारे मोबाइल में कैद कर दे। उसके बाद मैं अपने बेग को तलाशने लगा, तब तक भूप्पी ने कुछ तस्वीरें फेसबुक में डाल दी। इस बीच मेरे बेग भी मुझे मिल गए। इसके बाद मैं पूरे न्यूयार्क एयरपोर्ट को जी भरकर निहारा। रोशनी से नहाया हुआ एयरपोर्ट, दूर-दूर तक विदेशी यात्री, कुछ भारतीय यात्री भी दिख जाते। मेरी गोद में अर्पण थी, मेरा सामान भूप्पी ने उठाया हुआ था। हम बाहर आए। सामान गाड़ी में रखा। भूप्पी ने कहा-सीट पर बैठो। मैं भारतीय परंपरा के अनुसार अगली सीट पर बैठने जा ही रहा था कि आवाज आई, ओए प्राजी, उत्थे नई, इत्थे। मैं भौचक! तब भूप्पी ने खुलासा किया-डॉक्टर इस देश में लेफ्ट हेंड ड्राइविंग है। तुम उधर बैठो, मैं इधर बैठकर गाड़ी चलाता हूँ। पहली बार मैं उस स्थान पर बैठा, जहाँ भारत में ड्राइवर बैठते हैं। बड़ा अजीब-सा लगा। हमारी गाड़ी चल पड़ी फिलाडेल्फिया की ओर।
रास्ते में भूप्पी ने अमेरिका के बारे में जो कुछ बताया, उसमें पहले तो यातायात के नियमों का जिक्र करना चाहूँगा:-
यहाँ हार्न बजाना प्रतिबंधित है। यदि किसी चालक ने कुछ ही देर में तीन बार गाड़ी का हार्न बजा दिया, तो उसे पुलिस तुरंत डॉक्टर के पास ले जाकर उसका मानसिक परीक्षण करवाती है।
दस वर्ष से कम उम्र्र के बच्चे वाहन की अगली सीट पर नहीं बैठ सकते।
बच्चे को गोद में लेकर कहीं बाहर नहीं निकले सकते। बच्चा हमेशा (स्ट्राॅलर) बच्चा गाड़ी में ही होना चाहिए। इस गाड़ी को चलाने के लिए मॉल या स्टोर्स में विशेष व्यवस्था होती है।
हाइ वे पर ट्रकों के लिए अलग से सड़क होती है। उस सड़क पर कार नहीं जा सकती।
वहाँ कार वाहनों की लाइट दिन में भी ऑन रखी जाती है। वाइपर चल रहा हो, तो लाइट का ऑन होना अनिवार्य है। ये वहाँ का नियम है।
यदि आपने यातायात नियमों का तीन बार से अधिक उल्लंघन किया है, तो आपका लायसेंस रद्द हो सकता है। फिर आपका लायसेंस पूरे अमेरिका में कहीं भी नहीं बन सकता।
पिछले माह ही टेक्सास में गति सीमा से तेज चलाने पर एक व्यक्ति को टिकट मिल गया, वह व्यक्ति थे, जार्ज बुश यानी अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति। यानी वहाँ कानून व्यक्ति से ऊपर है।
यातायात नियमों के उल्लंघन के बाद यदि आपने पुलिस वाले को रिश्वत देने की कोशिश की, तो उसे यह अधिकार है कि वह आपको तुरंत िगरफ्तार कर ले। इस संबंध में पुलिसवालों का कहना है कि हमें कानून का पालन करवाने के लिए ही वेतन दिया जाता है। हमें पर्याप्त वेतन मिलता है, फिर हम अपने काम में बेईमानी क्यों करें?
रात के दो बजे भी यदि रेड लाइट है, तो आपको रुकना होगा। भले ही कोई ट्रेफिक न हो।
हर चौराहे पर सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, जिससे आपके वाहन के बारे में एक बार में पूरी जानकारी मिल जाती है।
आपके वाहन के आगे यदि कोई स्कूल बस हो और वह आगे जाकर बच्चों को उतारने लगी हो या फिर बच्चों को वाहन में लेने लगी हो, तो आप उस स्कूल बस को किसी भी तरह से क्रास नहीं कर सकते। भले ही ग्रीन सिगनल क्यों न मिल रहा हो। स्कूल बस के चलने पर आप उस वाहन को क्रास कर सकते हैं।
जहाँ जितनी स्पीड तय की गई है, वहाँ उतनी ही स्पीड आपके वाहन की होनी चाहिए। अन्यथा आपको जुर्माना हो सकता है। कई स्थानों पर ऐसी भी मशीन लगी होती है, जिसमें वहाँ की स्पीड लिमिट और आपके वाहन की स्पीड बताई जाती है। यानी आप वाहन स्पीड लिमिट से अधिक तेज चला रहे हैं। ये मशीन केवल आपको सूचित करती है कि आप वाहन की गति को नियंत्रित रखें।
टोल टैक्स देने के लिए वाहन को खड़े नहीं करना होता, वहाँ लगे कैमरे से कार के स्क्रीन पर लगे बिल्ले के नम्बर के मिलान से ही चालक के डेबिट कार्ड से राशि निकल जाती है।
हर 50 या 100 मीटर पर सिगनल होते हैं। इसलिए शहर से बाहर निकलने में ही आधा घंटा लग जाता है। इसके अलावा जिन चौराहों पर सिगनल नहीं लगे हैं, वहां आपको वाहन धीमा करना ही होगा। यातायात हो या न हो, यह नियम हमेशा लागू हाेता है।
चलते-चलते वाहन यदि खराब हो जाए, तो उसे सड़क के किनारे खड़े करने के लिए जगह होती है। वहां वाहन खड़े कर टो वाहन का इंतजार किया जाता है। इस वाहन को आने में अधिक समय नहीं लगता।
जाम की स्थिति बहुत ही कम आती है। बाइक दिखाई नहीं देती। यदि कहीं दिखी भी तो वह हार्ली डेविडसन पर भागते अंग्रेज ही दिखाई दिए।
पार्किंग के लिए अच्छी सुविधा है। जहाँ वाहन पार्क करना है, वहीं एक खंबे पर मशीन लगी है, जहाँ आप नियत समय तक अपना वाहन खड़ा कर सकते हैं, इसके लिए मशीन से ही भुगतान भी हो जाता है। तय समय से अधिक समय तक वाहन खड़ा मिला, तो िफर जुर्माना।
साइकिल के लिए अलग ट्रेक और उसे खड़े करने के लिए अलग से व्यवस्था होती है।
शनिवार-रविवार को साइकिल एवं बाइक किराए पर मिलते हैं। बाइक के लिए अलग से रास्ता होता है। लोग स्केटिंग करते हुए भी तेजी से निकल जाते हैं।
वहां के प्रत्येक पेट्रोल पंप पर एक रेस्टारेंट होता ही है। जहाँ यात्रियों की हर सुविधा का ध्यान रखा जाता है। आप वहां इत्मीनान से नाश्ता कर सकते हैं, फ्रेश हो सकते हैं। भारतीय लोगों के लिए विशेष रूप से शाकाहारी खाद्य सामग्री होती है। पेट्रोल अपने हाथ से ही लेना होता है। कहीं-कहीं वहाँ का कर्मचारी भी देता है। पेट्रोल को वहाँ गैस कहा जाता है। पेट्रोल का आशय वहां पुलिस की पेट्रोलिंग से लगाया जाता है। यह गैलन के हिसाब से मिलता है। वहां लीटर का प्रचलन नहीं है। एक गैलन में करीब तीन लीटर पेट्रोल आता है। पेट्रोल की कीमत में अधिक अंतर नहीं है।
गाड़ियाँ जीपीएस सिस्टम से चलती हैं, जहाँ जाना हो, वहाँ का डेस्टीनेशन फीड कर दिया जाता है, फिर तो जैसा जीपीएस का आदेश होगा, चालक अपना वाहन वहीं ले जाएगा। जीपीएस से यह भी पता चल जाता है कि कितने समय में डेस्टीनेशन तक पहुँचा जा सकता है। कहाँ रास्ता जाम है, कहाँ काम चल रहा है। कौन-सा मार्ग डायवर्सन पर है। ये सारी जानकारी जीपीएस से ही पहले ही मिल जाती है।
पूरे 19 दिनों में मैंने करीब तीन हजार किलोमीटर की यात्रा वाहन से की। पर रास्ते में कहीं भी न तो कोई जानवर देखा, न कोई ठेला वाला और न ही खराब वाहन। यदि वाहन स्टार्ट न हो, तो धक्का नहीं लगाया जाता, बल्कि वाहन में अलग से बैटरी हाेती है, जिसे वाहन की बैटरी से जोड़कर वाहन स्टार्ट किया जाता है। यदि बैटरी नहीं है, तो एक वायर होता है, जिसेे किसी दूसरे के वाहन की बैटरी से जोड़कर अपने वाहन की बैटरी को पावरफुल कर दिया जाता है, फिर अपना वाहन स्टार्ट किया जाता है।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 14 मई 2015

अमेरिका जैसा मैंने देखा-भाग 1

दिल्ली से अबूधाबी जाने वाले विमान में
 डॉ. महेश परिमल
अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी है, रटगर्स यूनिवर्सिटी। यहाँ हिंदी के लिए बहुत काम हो रहा है। वहाँ हर साल हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया जाता है। इस साल उसमें भाग लेने के लिए मुझे आमंत्रित किया गया था। आयोजन केवल तीन दिन यानी 3, 4 और 5 अप्रेल तक ही था, पर मैं वहाँ पूरे 19 दिन रहा। इसमें से तीन दिन तो न्यू जर्सी, 5 दिन बोस्टन और शेष दिन फिलाडेल्फिया में बिताए। इस दौरान खूब घूमना हुआ। कई संग्रहालय देखे। कई लोगों से परिचय हुआ। सबसे बड़ी बात यह रही कि अमेरिका में मुझे केवल अंगरेजी ही नहीं, बल्कि गुजराती, बंगला, पंजाबी और छत्तीसगढ़ी काम आई। अपने अनुभवों को शब्दों का रूप दे रहा हूँ। कहीं-कहीं अतिशयोक्ति हो सकती है। इसके लिए पहले से ही क्षमा चाहता हूँ।
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मैंने कभी करीब से विमान नहीं देखा था। घरेलू उड़ान का भी मुझे अनुभव नहीं था। मेरे सामने इंटरनेशनल उड़ान का प्रस्ताव था। हतप्रभ था। भीतर से कहीं अंगरेजी न आने की पीड़ा भी थी। इसके बाद भी मैं निकल पड़ा, एक दूसरी ही दुनिया को करीब से देखने के लिए। भोपाल से निकलकर मेरा पहला पड़ाव था, िदल्ली के मित्र विनोद वर्मा का घर। निजामुद्दीन में उतरकर नोएडा स्थित सीधे उनके घर ही पहुँचा। विनाेद भाई को विदेश यात्राओं को अच्छा-खासा अनुभव है। इसलिए उनके विदेश और विशेषकर विमान यात्राओं के अनुभवों को जाना। उन्होंने बड़ी सादगी से अपने अनुभव मुझसे बाँटे। कुछ हिम्मत बँधी। वे घर पर अधिक समय तक नहीं रह पाए। आवश्यक मीटिंग होने के कारण वे जल्द ही नौकरी के लिए िनकल पड़े। इसके बाद मोर्चा सँभाला, उनके पुत्र तथागत ने। उसने भी विदेश में एक वर्ष तक रहने और विमान यात्राओं के अपने अनुभव मुझे बताए। इसके बाद तो मैं चल निकला। मेट्रो से मैं राजीव चौक तक पहुँच गया। उसके बाद वहाँ से सीधे एयरपोर्ट। बड़ा ही आल्हादकारी अनुभव। मेट्रो ने केवल 19 मिनट में ही मुझे एयरपोर्ट पहुँचा दिया। इस ट्रेन में आप चालक से लेकर गार्ड के डिब्बे तक आराम से पहँुच सकते हैं या अपनी सीट पर बैठकर दोनों दिशाओं की ओर देख सकते हैं। पूरी तरह से वातानुकूलित इस मेट्रो ट्रेन पर बैठना अच्छा लगा। एक तरह से यह विदेशी अनुभव का पहला पाठ ही था। जहाँ मुझे जाना था, उसके पहले ककहरे का ज्ञान मुझे मेट्रो में बैठकर ही हुआ। उसके बाद जब मेट्रो से उतरकर एयरपोर्ट पर पहुँचा, तो लगा कि क्या यही भारत है? चमचमाते फर्श पर 
फिसलती सामानों की ट्राली। जो अशक्त हैं, उनके लिए व्हीलचेयर या फिर छोटी-सी मोटरगाड़ी, जिसमें करीब 7 लोग एयरपोर्ट के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुँच सकते हैं। एयरपोर्ट पर पहुँचकर सबसे पहले बोर्डिंग पास बनवाना होता है। यह टिकट होता है, जिसके आधार पर आपको यात्रा करने की अनुमति मिलती है। यहाँ मैंने देखा कि यदि आप किसी ने कुछ न पूछें, बल्कि एयरपोर्ट के दिशा निर्देशों का पालन करेंगे, तो आप सही स्थान पर पहुँच सकते हैं। कहाँ क्या करना है, वहाँ क्या होता है, यह सब-कुछ लिखा होता है, वह भी अंगरेजी में।
अबूधाबी में इंतजार करते यात्री
आपको यह जानकारी होनी चाहिए कि आपका टिकट किस एयरलाइंस का है, बस आप उस एयरलाइंस के काउंटर पर चले जाएँ, सब कुछ पता चल जाएगा। यहाँ एक बात देखने में आई, वह है अनुशासन। कोई भी कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसे लाइन पर लगना ही होगा। वोर्डिंग पास देने के पहले आपसे काफी पूछताछ होती है। वे अधिकारी यह जानना चाहते हैं कि आप विदेश केवल घूमने ही जाना चाहते हैं, उन्हें यह शक होता है कि लोग पर्यटन का पास बनवाकर वहीं बस जाते हैं। हालांकि ऐसे लोगों को खोज निकालना बड़ी बात नहीं होती। पर परेशानी इसी बात की होती है कि विदेश जाकर व्यक्ति अपना नाम-पता बदल देता है। यहाँ आपके बेग की पूरी तलाशी होती है। कहीं आप ऐसी कोई चीज तो नहीं ले जा रहे, तो विदेशों में प्रतिबंधित है। उनकी आपत्ति सबसे अधिक द्रव्य पदार्थ एवं अचार पर होती है। अचार को वे किसी भी तरह से खाने की चीज़ नहीं मानते। उनके लिए यह ज़हर से कम नहीं। बेग का वजन भी तौला जाता है।  एक बेग का वजन 23 किलो के भीतर ही होना चाहिए। आप 46 किलो से अधिक का सामान अपने साथ नहींं ले जा सकते। इससे अधिक वजन होने पर उसका अलग से चार्ज वसूला जाता है। इसके बाद एयरपोर्ट अधिकारी से यह जवाब मिलता है कि यह बेग आपको आपके लास्ट डेस्टिनेशन पर मिलेगा। यात्रा के अंतिम पड़ाव यानी आप जहाँ जाना चाहते हैं, उसके आखिरी स्टेशन पर। इसके साथ का बेग जो करीब 7 या 8 किलो का होता है, उसे आप अपने साथ विमान में भी रख सकते हैं। इस बेग को साथ रखकर हमें कई सुरक्षा संसाधनों से गुजरना होता है। आपके बेग की स्केनिंग तो होगी ही, आप की जेब में जो कुछ भी है, उसे भी बाहर निकालकर एक ट्रे में रखना होगा। उन चीजों का भी स्केन होता है। इन चीजों में शामिल है, पर्स, जूते, बेल्ट, डायरी आदि। अापके पूरे शरीर का भी स्केन होगा। ताकि यह पता चल सके कि आप अपने साथ कुछ भी आपत्तिजनक चीज नहीं ले जा रहे हैं। यह कार्य कई स्तरों पर होता है, इसलिए इसमें करीब डेढ़ घंटे का वक्त लग जाता है। इसके बाद आपको लाउंज पर बैठकर उस उद् घोषणा का इंतजार करना होता है, जो आपके विमान के बारे में होगी। इसके बाद सबके विमान में जाने की तैयारी होती है। यहाँ सभी के बोर्डिंग पास की बारीकी से जाँच की जाती है। काफी लंबी लाइन होती है। अपने बेग के साथ आप यहीं से सीधे विमान में प्रवेश कर सकते हैं।विमानतल में प्रवेश से लेकर विमान में प्रवेश करने तक जितनी भी जाँच होती है, वह न केवल एयरपोर्ट बल्कि देश की सुरक्षा से भी जुड़ी होती है। विमान में यात्रियों के लिए तीन श्रेणी होती ेहै। पहली बिजनेस, यह वह श्रेणी है, जिसमें यात्री को पूरा एक कमरा ही दे दिया जाता है। जहाँ पर आराम से सोया भी जा सकता है। कमरे में सारी सुविधाएँ होती हैं। इसके बाद होता है फर्स्ट क्लास। इसमें यात्री को थोड़ी ज्यादा जगह मिलती है। विमान में प्रवेश करते ही हमें फर्स्ट क्लास की सीटें दिखाई देने लगती हैं। उसके बाद की श्रेणी होती है, इकॉनामी। इसमें केवल बैठने की सीट होती है। जिसमें यात्री को 12 से 14 घंटे तक बैठना होता है। सीट कुछ पीछे हो सकती है, जिससे कुछ आराम मिलता है। विमान के अंदर होने वाली तमाम गतिविधियां और सामने की सीट पर लगे टीवी के कारण यात्री बोर नहीं होता। सीट पर लगे टीवी से हिंदी, अंग्रेेजी फिल्में, टीवी शो और फिल्मी गानों का आनंद लिया जा सकता है। इसके अलावा विमान की तमाम गतिविधियां जैसे वह कहाँ से होकर गुजर रहा है, भीतर का तापमान कितना है, बाहर का तापमान कितना है, विमान की गति कितनी है, विमान कितने मीटर की ऊँचाई पर है आदि जानकारी भी मिलती रहती है। यह बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी होती है। फिल्मों के बजाए हम अपना ध्यान इसी में लगाएँ, तो यात्रा सुखद और ज्ञानवर्धक बन सकती है।
मैं दिल्ली से अबूधाबी पहुँचा, वहाँ सघन जाँच से गुजरना पड़ा। इस दौरान मैंने पाया कि किसी को कोई हड़बड़ी नहीं है। सभी इत्मीनान से अपना सामान लेकर धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं। जाँचकर्ता अधिकारी को पूरा सहयोग कर रहे हैं। कहीं किसी तरह की कोई बहस नहीं। सभी लोग प्रसन्नता पूर्वक अपने सामान की जाँच करवा रहे हैं। आगे जाने वाले यात्रियों के पास दूसरे विमान में जाने के लिए काफी वक्त था, इसलिए बिना हड़बड़ी के सारे काम संपादित होते रहे। थोड़ी-सी झुंझलाहट तब हुई, जब एक सघन जाँच के कुछ ही देर बाद दूसरी सघन जाँच से गुजरना पड़ा। पुन: वही प्रक्रिया। बेल्ट, जूते, मोजे, पर्स, मोबाइल, डायरी आदि सब कुछ ट्रे में रख दो,वह ट्रे स्केनर से होकर गुजरेगी। यदि कुछ गलत पाया गया, तो आपको रोक लिया जाएगा। इसके बाद भी एक और पूछताछ से गुजरना होता है। आप किस देश में जा रहे हैं और क्यों? वहाँ जाकर क्या करेंगे? वहाँ आपके रहने का पता-ठिकाना क्या होगा? आपको अंगरेजी नहीं आती, पूछने वाला यदि अंगरेज है, तो यहाँ भाषा नहीं, हमारा आत्मविश्वास काम आएगा। वह हमारी आँखों को ही पढ़कर हमारी ईमानदारी को पहचान जाता है। मेरे-उसके बीच थोड़ी-बहुत बातचीत हुई, जिससे वह समझ गया कि यह केवल हिंदी सम्मेलन में भाग लेने जा रहा है।
न्यूयार्क एयरपोर्ट में भूप्पी अपने परिवार के साथ लेने आए
वैसे उनके पास हमारी दी हुई सभी जानकारियाँ होती हैं। इसके बाद भी वे अवश्य पूछते हैं कि आपका लौटना कब होगा? वहाँ जाकर अाप क्या करेंगे? किस तरह से करेंगे? इस तमाम बातों से संतुष्ट होकर वह एक निश्चित ितथि तक आपको उस देश में रहने की अनुमति देते हैं। मुझे अक्टूबर तक यानी छह माह तक अमेरिका में रहने की अनुमति मिली थी। इसके बाद भी वहाँ काफी समय तक आराम करने का अवसर मिला। अबूधाबी से न्यूयाके के लिए विमान सुबह 5 बजे रवाना हुआ। कुछ देर बाद सुबह का नजारा विमान से देखा। बहुत ही अच्छा लगा। विमान दिन भर उड़ता रहा। इसी बीच करीब 13 घंटे की यात्रा पूरी होने के कुछ घंटे पहले एक सूर्योदय और देखा। उस समय विमान कहाँ से उड़ रहा था, यह समझ नहीं आया। पर एक ही दिन में दो सूर्योदय देखना अपने आप में एक सुखद अनुभव था। जब भारत में शाम के पौने 6 बज रहे थे, तब न्यूयार्क में सुबह के सवा नौ बज रहे थे। उसी समय विमान न्यूयार्क एयरपोर्ट पर उतरा। वहाँ मेरे साथी भूपिंदर, अपनी पत्नी और प्यारी-सी बिटिया अर्पण को लेकर मेेरा इंतजार कर रहे थे। मुझे देखते ही भूप्पी ने मुझे बुरी तरह से अपनी बाँहों में जकड़ लिया। बाँहों की जकड़न आज भी याद है। इस जकड़न में था, उनका प्यार, विश्वास और अपनापन। जिसका मैं पूरी अमेरिका यात्रा के दौरान कायल रहा।
अब अगले भाग में लिखूंगा, अमेरिका की यातायात व्यवस्था पर.....
डॉ. महेश परिमल



आम आदमी से बहुत दूर हैं ‘अच्छे दिन’

डॉ. महेश परिमल
अच्छे दिन आएंगे, के बुलंद नारे के साथ भाजपा ने केंद्र में सरकार तो बना ली। पर अब यह स्लोगन भाजपा वालों के लिए ही गले की हड्‌डी बन गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व फलक पर भले ही अपनी छवि को बहुत ही उज्जवल बना दिया हो, पर सच तो यह है कि देश के भीतर ही उनकी छवि लगातार बिगड़ती जा रही है। अब तो हालत यह है कि केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि आरएसएस के वरिष्ठ नेता भी सरकार की आलोचना करने में पीछे नहीं है। अब तो अच्छे दिन के स्लोगन पर लोग जोक्स तैयार करने लगे हैं। इस स्लोगन का गुणगान करने वाले ही अब इसका जवाब मांगने लगे हैं कि आखिर कब आएंगे अच्छे दिन? दिनों दिन नरेंद्र मोदी पर दबाव बढ़ता जा रहा है कि वे ही बताएं कि अच्छे दिनों की राह आखिर कब तक देखी जाए? कभी प्रधानमंत्री के समर्थक कहे जाने वाले राम जेठमलानी, सुब्रमण्यम स्वामी और अरुण शौरी जैसे लोगों के आक्रामक बयान आने लगे हैं। भू-अधिग्रहण विधेयक के मामले में समर्थक दलों का विश्वास प्राप्त करने में विफल रही सरकार ने कांग्रेस को बैठे-बिठाए एक मुद्दा दे दिया है।
चुनाव के पहले किए गए वादों को पूरा करने या उस दिशा में आगे बढ़ने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया, ऐसी बातें सरकार के खिलाफ जमकर की जा रही हैं। हाल ही में पेट्रोेल-डीजल के दामों में की गई वृद्धि के बाद लोगों में यह बात घर कर गई है कि यह सरकार पूंजीपतियों की सरकार है। जिसे मात्र कुछ लोग ही चला रहे हैं। अच्छे दिनों के बारे में कोई मंत्री कुछ भी कहना नहीं चाहता। मोदी सरकार का यही कहना है कि हमारी सरकार अभी पिछली सरकार द्वारा किए गए कार्यों का खामियाजा भुगत रही है। खामियाजे की यह बात यदि एक वर्ष बाद की जाए, तो समझ में नहीं आता। अब तो लोग सीधे जवाब चाहते हैं। अब उनके सब्र का बांध टूटने लगा है। सरकार ने वृद्धि दर बढ़ाने के लिए मेक इन इंडिया, डीजिटल इंडिया आदि के माध्यम से रोजगारी बढ़ाने की बात कर रहीे है, पर रोजगारी की दिशा में किसी तरह का सुधार दिखाई नहीं दे रहा है। भाजपा के पास आरएसएस जैसा शक्तिशाली संगठन होने के बाद भी वह किसानों की समस्याओं को पूरी तरह से समझने में विफल साबित हुई। जब वरिष्ठ नेता अरुण शौरी ने कहा कि भाजपा सरकार को केवल तीन लोग ही चला रहे हैं, इससे सरकार को सचेत हो जाना चाहिए। ऐसा भी नहीं है कि इस तरह के आरोप पहले कांग्रेस सरकार पर नहीं लगे हैं। उस सरकार पर भी यही आरोप था कि पूरी सरकार को केवल तीन लोग ही चला रहे हैं, मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी। पहले नरेंद्र मोदी इसी बात को लेकर कांग्रेस का मजाक उड़ाया करते थे, अब वही बात उनकी ही पार्टी के लोग कहने लगे हैं और उनका ही मजाक उड़ाने में लगे हैं।
शायद एनडीए सरकार को यह पता नहीं है कि पांच वर्ष तो कुछ समय बाद ही गुजर जाएगा। आखिर उन्हें जाना तो प्रजा के बीच ही है। स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद भी यदि सरकार अपने मन-माफिक काम न कर पाए, तो यह प्रजा के लिए आघातजनक ही है। भू-अधिग्रहण का मामला सरकार के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। पर जब भी भाजपा सरकार ने अपने अभिमान का प्रदर्शन किया है, तब उसे मुँह की खानी पड़ी है। अब तो मीडिया 24 घंटे सरकार की तमाम हरकतों पर नजर रखने लगा है। हालत यह हो गई कि सरकार अपनी उपलब्धियों का बखान भी नहीं कर पा रही है। एक न एक एेसा मामला सामने आता जा रहा है, जिससे सरकार की फजीहत हो रही है। कभी अपने ही नेताओं की बदजुबानी ही सरकार को सवालों के घेरे में खड़े कर देती है। सरकार के पास दूरंदेशी योजनाएँ हैं। किंतु वर्तमान को सुधारने के लिए उसके पास ऐसी कोई योजना नहीं है, जिससे लोगों को थोड़ी-बहुत राहत मिले। प्रजा तमाशा देख रही है। किसानों का मामला सामने आते ही रातों-रात सभी किसान प्रेमी होने लगे हैं। प्रजा मानती है कि सरकार के सामने अरबों रुपए के घोटाले के मामले सामने आए हैं। फिर भी सरकार इस दिशा में सख्त कदम नहीं उठा पा रही है। यह सवाल हर सांसद को मुिश्कल में डाल सकता है। वह उद्योगों और निवेशकों से आगे देख ही नहीं पा रही है। प्रजा की तात्कालिक समस्याओं को ताक पर रखकर सरकार उसे देश के 100 स्मार्ट सिटी का सपना दिखा रही है। जनता अभी सुविधा चाहती है। भविष्य की बात नहीं करना चाहती, पता नहीं सरकार को यह बात कौन बताएगा? एक तरफ सरकार विदेशी निवेशकों के लिए लाल-जाजम बिछा रही है, तो दूसरी तरफ स्थानीय उद्योगों को किसी तरह का प्रोत्साहन देने को तैयार नहीं है।
प्रधानमंंत्री नरेंद्र मोदी का जादू अब टूटने लगा है। कांग्रेस उनकी आलोचना करे, यह संभव है, पर जब उनकी आलोचना आरएसएस ही करने लगे, तो बात गंभीर हो जाती है। प्रधानमंत्री अपने पर लगे आरोपों का जवाब नहीं देते, इससे लगता है कि वे गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में स्वयं को स्थापित कर रहे हैं। लोग उनके व्यवहार में तानाशाही का अंश देखने लगे हैं। आर्थिक मामलों में मोदी सरकार बुरी तरह से फंसी हुई है। ऐसे में वह फारेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट प्राप्त करने के लिए हाथ-पैर मार रही है। अभी तक सरकार ने निवेशकों का विश्वास नहीं जीता है। इसका निवारण करने के बजाए वह पिछली सरकार की खामियों को उजागर करने में लगी है। प्रजा की अपेक्षाएं लगातार बढ़ रही हैं। प्रधानमंत्री संगठन और राज्य स्तर की प्रशासनिक सेवाओं को बेहतर समझते हैं। लेकिन देश की सरकार चलाना जरा मुश्किल है। सभी देख रहे हैं कि रोज एक नई समस्या मुंह बाय खड़ी रहती है। सरकार इस समस्या का समाधान खोजने के बजाए यूपीए सरकार की गलती बताकर अपना पल्ला झाड़ रही है। मोदी सरकार यह मानकर चल रही है कि उनके मंत्री काम तो कर रहे हैं, पर वे काम दिखाई नहीं दे रहे हैं। या फिर सरकार के काम का प्रचार मंत्री कर नहीं पा रहे हैं। प्रजा तो एक ही रट लगा रही है कि बाकी सब कुछ छोड़ो, हमें अच्छे दिन दिखाओ। पर अब जनता के सब्र का बांध टूट रहा है। मोदी सरकार पर की गई अपेक्षाएं अब पूरी नहीं हो पा रही है। उनके वादों का गुब्बारा अब फूट चुका है। अब कुछ नहीं होने वाला। दुख इस बात का है कि जिस प्रधानमंत्री पर पूरा भरोसा कर उन्हें सत्ता सौंपी, उन पर ही विश्वास नहीं रहा।
‎डॉ. महेश परिमल

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