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12:24 pm
 डॉ. महेश परिमल
 बिहार चुनाव के बाद यह साफ हो गया है कि वहां यदि कुछ हारा है, तो वह है घमंड और जीता है, तो वह है आम आदमी। बिहार की जनता को मूर्ख मानना ही सबसे बड़ी मूर्खता साबित हुई। बिहार की जनता ने बता दिया कि हम आपका भाषण सुन तो लेंगे, पर करेंगे वही, जो हम चाहते हैं। बिहार की जनता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक तरह से आईना दिखा दिया है। 1990 में लालू प्रसाद यादव ने लालकृष्ण आडवाणी का रथ रोका था, इस बार उसने मोदी का विजयी रथ रोक दिया। आडवाणी का रथ रोके जाने पर सरकार पलट गई थी। पर नरेंद्र मोदी का रथ रोककर लालू यादव का पूरा परिवार ही किंग मेकर बन गया। शिकारी को किस तरह से उसके ही जाल में फंसाया जाता है, यह लालू ने इस चुनाव में बता दिया है। इस जीत से लालू ने कई मरणासन्न लोगों को जीवनदान दिया है। विशेषकर कांग्रेस को, अब तक कांग्रेस हाशिए पर थी, पर इस जीत से कांग्रेस में भी जोश आ गया है। वह भी अब खुलकर मोदी का विरोध करने लगी है। अब तो उसने लालू-नीतिश की सरकार में शामिल होने का भी फैसला ले लिया है। कांग्रेस के मुंह में हंसते-हंसते मानो बताशा आ गया हो। उसे एक मोटीवेशनल इंजेक्शन की आवश्यकता थी, जो अब बिहार में भाजपा की करारी हार से मिल गया है। देश में असहिष्णुता के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले एक तरफ होंगे और सारे विपक्ष एक साथ मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलेंगे, यह तय है। बिहार को खोना मोदी सरकार के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। अब तक राज्यसभा कोई विधेयक पारित करवाने में जितनी परेशानी आती थी, उससे भी अधिक परेशानी अब आएगी। राज्यसभा में भाजपा का बहुमत न होने के कारण जो फजीहत होगी सो अलग। अब सानमे आने लगा है कि मोदी आवश्यकता से अधिक आत्मविश्वासी हो गए थे। बिहारियों को यह बिलकुल भी पसंद नहीं आया कि कोई बाहरी उनके आदमी को ‘इडियट’ कहे। उस समय तो उन्होंने उन्हें सुन लिया, पर समय आने पर अपनी बात रख दी। इसके अलावा मोदी ने अपने भाषण में जो कुछ कहा, लालू-नीतीश ने उसे दूसरे ही स्वरूप में जनता के सामने लाया। पेकेज देने के मामले में मोदी कुछ अधिक ही उदार दिखने लगे थे। जबकि इसके पहले कांग्रेस शासन में राहुल गांधी कहते थे कि हमने इस राज्य का इतन धन दिया, तो उसके एवज में मोदी कहते थे कि यह धन क्या उन्हें उनके मामा ने दिया था। देश का धन है, देश में ही लगाया, तो इसमें कौन-सा बड़प्पन दिेखा रहे हो। यह बात वे बिहार के लिए पेकेज की घोषणा करते समय भूल गए। उन्होंने जिस तरह से पेकेज की घोषणा की, उससक लगा कि वे यह राशि अपनी जेब से दे रहे हैं। जबकि वे बिहार को उसका हक दे रहे थे। वै कोई खैरात नहीं बांट रहे थे। पेकेज का यह पासा भी उलटा पड़ गया। भाजपा को उसकी यह तिकड़ी भारी पड़ी। मोदी, जेटली और शाह ने मिलकर जो व्यूह रचना तैयार की थी, वह धूल-धूसरित हो गई। पूरी पार्टी में इसी तिकड़ी की ही चल रही है। इस आशय की शिकायत गृहममंत्री राजनाथ सिंह ने संघ प्रमुख से भी की थी। आज भी यह तिकड़ी पूरी पार्टी को दिशा-निर्देश दे रही है। भाजपा के लिए यह आत्ममंथन का समय है। आगे चुनाव को देखते हुए उसे अपना दंभ छोड़ना होगा। न तो अच्छे दिन आए, न आएंगे। क्योंकि अच्छे दिन लाने की संभावनाएँ होने के बाद भी सरकार ऐसा कुछ नहीं कर पाई, जिससे आम लोगों को महंगाई से राहत मिले। क्रूड आइल जब सस्ता था, तब जो रािश बची, उसे ही यदि महंगाई पर अंकुश लगाने में खर्च कर दिया गया होता, तो हालात ऐसे न होते। महंगाई की मार झेलते हुए चुनाव हुए, तो जनता अपना रोष तो प्रकट करेगी ही। दालों की महंगी स्थिति को भी काबू करने में सरकार ने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया, जिससे लोगों को राहत मिलती। न मुनाफाखोरों पर कार्रवाई की, न ही जमाखोरों पर अंकुश लगाया। सभी को खुली छूट मिल गई। भाजपा की काफी बदनामी हुई, इसे वह भले ही विदेशी षड्यंत्र माने, पर सच तो यह है कि महंगाई से जूझती जनता के लिए सरकार के कदम नाकाफी थे। विदेश प्रवास कर प्रधानमंत्री देश की साख बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, पर वे यह भूल रहे हैं कि देश में ही उनकी साख धूमिल हो रही है। देश में आज जो अराजकता की स्थिति है, उसे दूर करने के लिए भी ऐसा कुछ नहीं किया, पहले तो उन्हें अपने ही नेताओं की जबान बंद रखनी थी। इस दौरान भाजपा नेताओं की जबान से मानों अंगारे निकल रहे हों। कोई लगाम ही नहीं। कुछ भी बोले जा रहा है। जिसने पार्टी के खिलाफ कुछ भी कहा, नेता उसी को निशाना बनाने लगते हैं। जरा उसकी सुन तो लेते, कहीं वह सच तो नहीं बोल रहा है। पार्टी में सच बोलने की सजा बहुत ही सख्त है, यह तो अब तक कांग्रेस में देखा जाता था, पर लगता है भाजपा ने इसे अपना लिया है। बिहार एक अनुत्पादक राज्य है। यहां बेरोेजगारी बहुत है। कई ऐसी शकर मिलें हैं, जो बंद पड़ी हैं। लोग रोजी-रोटी के लिए दूसरे राज्यों में जा रहे हैं। आज शायद ही कोई ऐसा राज्य हो, जहाँ बिहारी अपनी रोजी-रोटी की तलाश में न पहुंचे हों। महाराष्ट्र और गुजरात में बिहारियों की भरमार है। इससे ही बिहार की बेराजगारी का पता चल जाता है। फिर भी बिहार सबको प्यारा है। इसलिए वोट देने के लिए सुदूर प्रांतों से बिहारियों ने आकर अपना वोट दिया और इतिहास ही रच डाला। इन्हें अपने क्षेत्र में बुलाने के लिए लालू यादव ने जो अनुनय-विनती की, उसी के कारण मतदाता एक तरह से उसकी गोद में ही बैठ गए। समय बड़ा बलवान है, यह भी इस चुनाव से पता चलता है। भाजपा ने यहां भी अपनी ढुल-मुल नीति जारी रखी। आखिर तक उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए कोई योग्य उम्मीदवार नहीं मिला। अंदर ही अंदर भाजपा में कलह थी। वह इससे उबर नहीं पाई। इसके अलावा भाजपाध्यक्ष ने कई ऐसे लोगों को टिकट दे दी, जो आपराधिक प्रवृत्ति के थे, इससे लोगों को लगा कि यदि ये जीत गए, तो फिर गुंडागर्दी शुरू हो जाएगी। इसलिए भाजपा को हराया जाए। दूसरी ओर प्रचार के लिए लोग दिल्ली से बुलाए गए। स्थानीय लोगों की घोर उपेक्षा की गई। इससे लोगों में भाजपा के प्रति नाराजगी दिखाई दी। दिल्ली में जिस तरह से किरण बेदी को सामने लाया गया था, एक तरह से वही गलती फिर दोहराई गई। इस बार उसके पास मुख्यमंत्री का चेहरा ही तय नहीं था। दिल्ली चुनाव से भाजपा को सबक लेना था, जो वह नहीं ले पाई। भाजपा महागठबंधन की व्यूह रचना को नहीं समझ पाई। एक तरफ लालू-नीतिश ने बिहार संभाला, तो दिल्ली में भाजपा को बदनाम करने का काम कांग्रेस ने किया। असहिष्णुता के नाम पर आंदोलन चलाने में कांग्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उधर अरुण शौरी ने पार्टी को बदनाम कर दिया। शत्रुघ्न सिन्हा भी अपने बड़बोलेपन के कारण पार्टी को निशा बनाते रहे हैं। उन्हें पार्टी ने अलग करने का काम भाजपा ने ताक पर रख दिया। इससे उसकी कमजोरी सामने आ गई। उन्हें चुनाव से दूर रखा गया। अपनी अवहेलना वे सहन नहीं कर पाए, अब भाजपा की करारी हार के बाद वे खुलकर नीतिश की प्रशंसा कर रहे हैं। चुनाव में हार-जीत तो चलती ही रहती है, इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि हारने वाला चुपचाप बैठ जाए। ऐसा लगता है कि भाजपा में अब कीलर इंस्टीक्ट ढीला पड़ गया है। अरुण शौरी, राम जेठमलानी, शत्रुघ्न सिन्हा जेसे लोगों ने भाजपा को बदनाम किया। सिन्हा को पार्टी ने अलग करने का मन बना लेने के बाद भी उसकी घोषणा को ताक पर रख दिया गया। अब तो काफी देर हो गई है। उन्हें अब पार्टी से निकाला जाता है, तो वे हीरो बन जाएंगे। इस बार भाजपा को गलत रास्ते पर लाने वाले तमाम कारक जो परिणाम के पहले भाजपा की जीत का सर्वेक्षण कर रहे थे, वे सभी चारों खाने चित्त हो गए। ज्योतिषियों ने भी खूब कहा था कि भाजपा को बहुत आगे जाना है, अब वे स्वयं ही अपने लिए रास्ता तलाश कर रहे हैं। कमल कीचड़ में ही खिलता है, अब भाजपा ऐसा कहना छोड़कर जो वादे किए हैं, उसके कमल खिलाए, तो लोगों को कुछ राहत मिले। चुनाव परिणामों ने भाजपा के गाल पर जो तमाचा जड़ा है, उसकी गूंज दूर तक जानी चाहिए, ताकि सभी को पता चल जाए कि अहंकार का अंत किस तरह से होता है। देखा जाए, तो इस चुनाव में घमंड हारा है, सादगी की जीत हुई है।
 डॉ. महेश परिमल
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