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12:13 pm
मुफ़लिसी यानी कि गरीबी आदमी को कितना लाचार और बेबस बना देती है, इसका शाब्दिक वर्णन नज़ीर अकबराबादी ने क्या खूब किया है - जब रोटियों के बँटने का आकर पड़े शुमार, मुफलिस को देवें एक तवंगर को चार-चार, गर और माँगे वह तो उसे झिड़के बार-बार, इस मुफ़लिसी का आह बयां क्या करूँ मैं यार, मुफ़लिस को इस जगह भी चबाती है मुफ़लिसी... सामना कीजिए इस रोचक रचना का...

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