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राजा मृणालसेन ईश्वर के भक्त थे। राज्य पर ईश्वर की कृपा रहे, इसके लिए उन्होंने एक पुरोहित नियुक्त किया था। वह मृणालसेन के नाम पर ईश्वर की भक्त‍ि किया करते थे। इस कार्य के लिए उन्हें सौ स्वर्ण मुद्राएँ माहवार मिला करती थी। दीप, धूप, तेल, अगरबत्ती आदि राज्य के एक व्यापारी की दुकान से आया करती थी। व्यापारी जानता था कि यह सामग्री राजा मृणालसेन के पूजा कार्य के लिए जाया करती है। इस सब सामग्री के लिए राजकोष से हर माह रूपया निकलता था, लेकिन व्यापारी तक रूपया पहुँचता ही नहीं था। वह सारा रूपया लालची कोषाध्यक्ष हड़प कर जाता था। व्यापारी के बेटे को जब ये बात मालूम हुई तो उसने इसका विरोध किया और अपने पिता को अन्याय सहन न करने की सलाह दी मगर पिता ने यह कहकर उसे शांत कर दिया कि जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा। पिता और पुत्र की यह बात राह चलते राजा ने सुन ली। उन्होंने क्या न्याय किया, ये जानने के लिए सुनिए बाल कहानी - पूजा का सच...

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