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आरती रॉय की कहानियों को पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानो ये तो हमारे ही आसपास के पात्र हों, जिनके बारे में हमने सोचा भी नहीं था कि इस पर कुछ लिखा भी जा सकता है। बिलकुल हमारे बीच का कोई व्यक्ति, जो हमारे बीच ही रहकर हमसे अनजाना-सा रहा है। आरती जब लिखती है तो लिखती ही चली जाती है। कुछ ही घंटों में तैयार होने वाली उनकी कहानियाँ बिलकुल उन्हीं की तरह सहज और सरल है। बिना किसी लाग-लपेट के वह अपने पात्रों के चरित्र को शब्दों का रूप दे देती हैं। उनकी कहानियों के पात्र स्वयं ही उनके पास चलकर आते हैं। पात्र तो हम सभी के बीच भी होते हैं, पर हम में से हर कोई उसे सँवार नहीं पाता। आरती ये कला खूब जानती हैं। फुलमतिया इस कहानी का एक ऐसा ही सरल पात्र है, जो हमारा मन मोह लेता है। प्रस्तुत है कहानी का कुछ अंश - मैं जैसे आसमान से गिर पड़ा। समाज में निहित विसंगतियों, विकृतियों, रूढि़यों का प्रभाव इस शहर में इस भॉंत‍ि होगा, मैं सोच भी नहीं सकता था। मुझे समझ में नहीं आया कि उसके मन में ये कैसे बिठाऊँ कि हम सभी बराबर होते हैं। ऊँच-नीच, छोटा-बड़ा ये भेदभाव हम मनुष्य ने ही बनाए हैं। ईश्वर ने तो हम सभी को एक समान ही बनाया है। मैंने उसकी करूणायुक्त आँखों को प्यार से देखा। उसके सिर पर हाथ फेरा। पूरी कक्षा की लड़कियों में विस्मय झलक रहा था। मैंने प्यार से उसका नाम पूछा। वह बोली - फुलमतिया। कौन थी ये फुलमतिया और लेखक को उसके प्रति इतनी करूणा और संवेदना क्यों थी कि वो समाज के भेदभाव की गंभीर समस्या को लेकर सोचने लगे थे। इन सारे प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए सुनिए कहानी - गुरूदक्षिणा...

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