अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

एक कलाकार अपनी कला को नाम जरूर देता है। एक रचनाकार की रचना भी उसके नाम से पहचानी जाती है लेकिन भारतीय संस्कृति में एक नारी ही ऐसी रचनाकार है जो अपनी रचना को नाम नहीं दे पाती है। उसकी सृजन कृति उसकी कोख से जन्म जरूर लेती है लेकिन उसे नाम पिता का ही मिलता है। जब हम स्वयं को ये अधिकार दे देंगे कि संतान के साथ माता का नाम ही संवैधानिक रूप से जोड़ा जाए तभी वो सही अर्थों में महिला दिवस होगा। महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत है यह कविता...

एक टिप्पणी भेजें

  1. बहुत सुन्दर लगी कविता ..
    सामयिक प्रस्तुति हेतु धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.