अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

2:41 pm
दो भाई थे । अचानक एक दिन पिता चल बसे । भाइयों में बंटवारे की बात चली-''यह तू ले, वह मैं लूं, वह मैं लूंगा, यह तू ले ले ।'' आए दिन दोनों बैठे सूची बनाते, पर ऐसी सूची न बना सके, जो दोनों को ठीक लगे । जैसे-तैसे बंटवारे का मामला सुलझने लगा, तो एक खरल पर आकर उलझ गया । ''पिता जी अपने लिए इस खरल में दवाइयां घुटवाते थे । उसे तो मैं ही अपने पास रखूंगा ।'' बड़े ने कहा । छोटा तुनककर बोला-''यह तो कभी हो नहीं सकता । दवाइयां घोट-घोटकर तो उन्हें मैं ही देता था । उनकी निशानी के तौर पर मैं इसे रखूंगा ।'' बात बढ़ गयी और सारा किया-धरा चौपट । अब पंचों से फैसला कराना तय हुआ । पंच चुने गए । उन्होंने सबसे पहले दोनों को घर से बाहर निकाला और दो ताले द्वार पर डाल दिये । तय हुआ-बंटवारा दो दिन बाद करेंगे । दोनों में से अब कोई भाई अकेला भीतर नहीं जा सकता था । पर हमारे समाज में वे भी तो है, जो द्वार से घर में नहीं घुसते । रात हुई, चोर दीवार लांघकर भीतर घुसे और सारा माल समेटकर गायब हो गये । दो दिन बाद घर खोला गया । अब बांटने को धन बचा ही नहीं था । दोनों भाई खड़े-खड़े हाथ मल रहे थे । एक कोने में पड़ा खरल उन्हें चिल्ला रहा था । दोनों भाइयों ने पंचों के हाथ जोड़े । कहा-'' अब बंटवारा नहीं होगा । हम साथ-साथ ही रहेंगे ।'' खरल के झगड़े ने धन गंवा दिया । मेल से रहना और प्रेम बांटना ही सुखी जीवन बिताने का सूत्र है । इसे ऑडियो के माध्यम से सुनकर आनंद लीजिए...

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.