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कहानी का कुछ अंश... “मैं तो दूध, घी को कभी अपने मुँह के पास भी नहीं लाती! नाम के लिए यह मेरे पास रहता है। यदि किसी को शंका हो, तो मालिकाना अपने पास रख ले,” बूढ़ी दादी ने अपनी बहुओं से कहा। “मैं मालकिन होती तो खुद भी खाती और अपने बहुओं को भी खिलाती। ऐसा क्या मालिकाना कि जीभ तरसती रहे और हांथ देने में लगे रहें,” मझिली ने व्यंग्य के साथ कहा। “खबरदार! ...........आगे कुछ कहा तो! जीभ तरसे मेरे दुश्मन की! मेरी तो कभी इच्छा ही नहीं होती है।” “आपकी इच्छा नहीं होती पर हम लोगों की इच्छा तो होती है कि दूध, दही और घी की सुगंध कभी-कभी नाक में चली जाए।” “मेरे जीते जी तुम्हारी नाक सुगंध को तरसती ही रहेगी।” यह कहकर बूढ़ी दादी आँगन से उठकर अपने कमरे में चली गईं। वह गुस्से के साथ जब चलती हैं, तब उनके हाथ और पैर के चाँदी के बंहुटे खनखनाने लगते हैं। दूध, घी का मालिकाना बूढ़ी दादी के ही पास है। वह बड़े जतन से इसका बटवारा किया करती हैं। बटवारे में सबसे पहले घर के बच्चे, फिर पुरुष और अंत में स्त्रियों का नंबर आता है। बूढ़ी दादी का ऐसा मानना है कि घर की लक्ष्मी का यह कर्तव्य है कि वह पहले घर के सब सदस्यों को खिलाए और फिर अंत में खुद खाए। उन्होंने अपने जीवन में सिर्फ त्याग किया है और यही वह अपने बहुओं से उम्मीद करती हैं। उनके त्याग का ही परिणाम है कि आज गेंदलाल के पास चालीस एकड़ ज़मीन है। जब बूढ़ी दादी अपने ससुराल आई थी, उस समय गेंदलाल के पास सिर्फ दस एकड़ ज़मीन थी। यह उन्हें अपने पिता से हिस्सा बटवारा में मिली थी। गेंदलाल के चार बच्चे हुए अतः उन्होंने भविष्य को ध्यान में रखकर जहाँ भी मौका मिला, ज़मीन को खरीदा। वह बहुत पढ़े-लिखे नहीं थे पर बुद्धिमानी में किसी एम. ए. पास से कम नहीं हैं। चार बच्चों को खाने के लिए अन्न की ज़रूरत पड़ेगी, इसीलिए ज़मीन को खरीद लिया। बूढ़ी दादी ने एक-एक पैसे को जोड़ा है, तभी गेंदलाल ज़मीन खरीद पाए हैं। उन्होंने कभी अपने लिए पैसे, गहने और कपड़े कि माँग नहीं की। गेंदलाल जो खरीद देते थे, वही पहन लेती थी। गहना तो वह मायके से ही लाई थी.......गले में बँधी सोने की अध्धियाँ, हांथ और पैर के चांदी के बंहुटे, एक्कीस तोले चाँदी की करधनी और अन्य बहुत से गहने। गेंदलाल से उन्होंने न तो कभी कोई माँग की और न ही गेंदलाल ने अपने से खरीदने कि कोई पहल की। आगे की कहानी ऑडियो की मदद से सुनिए...

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