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कविता का कुछ अंश... चटटानें जहाँ पाठ हैं, हमारी सभ्यताओं का, आदि मानव का रहवास रहीं हैं गुफाएँ, अज्ञातवास कि जहाँ बैठते थे परमबलशाली भीम, वही है भीम बैठका। भीम बैठका एकांत की कविता है, जो कुछ ज्ञात में, कुछ अज्ञात में सुनी जा सकती है। ध्यान से देखिए न आप, भीम का मौन, चटटानों को कितना अथाह बना चुका है। इन चटटानों में भीम के तन-मन की आग भरी है। स्पर्श में कविता है। भीम का नाम सुनते ही, यहाँ के पेड, पाखी, कितने वाचाल हो गए हैं... आगे की कविता का ऑडियो के माध्यम से सुनिए...

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