अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

4:28 pm
वर्तमान समाज में महिला अपनी सुरक्षा कैसे करे ?

जिस देश में अजन्मी बिटिया को
कोख में मारा जाता हो,
जिस देश में दहेज का दानव
बहू को लील जाता हो,
उस देश में दुर्गा पूजा की
बातें बेमानी लगती है।
नारी की आज़ादी बस एक
झूठी कहानी लगती है।
आज महिलाएँ हर क्षेत्र में अपनी एक अमिट पहचान बना रही हैं। क्षेत्र कोई भी हो, महिलाएँ पुरुषों से पीछे नहीं हैं। आज की महिलाएँ व्यावसायिकता के क्षेत्र में जितनी सफल हो रही हैं, उतनी ही कुशलता से वह घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी भी संभाल रही हैं। यही कारण है कि आज की महिला को सही मायने में आधुनिका कहा जा सकता है, क्योंकि उसने अपनी सभी दुर्बलताओं को दूर करके अपने आपको मजबूत करने की पुरजोर कोशिश की है। इसमें वह कामयाब भी रही है, तभी तो उसका व्यक्तित्व आज एक साहसी, परिपक्व, सहिष्णु तथा एक मजबूत इरादेवाली महिला के रूप में उभरकर समाज के सामने आया है।
आज की महिला ने अपनी संकीर्ण विचारधारा को त्याग कर अपने अंदर आत्मविश्वास पैदा कर लिया है। तभी तो वह एक तरफ ‘‘कैरिअर वुमन‘‘है तो दूसरी तरफ ‘‘होममेकर‘‘ भी। यदि इसे ‘‘सुपर वुमन‘‘ की संज्ञा भी दी जाए तो ये गलत न होगा।
आज की महिला ये अच्छी तरह से जानती है कि आज के प्रगतिशील पुरुष को केवल खाना बनाने वाली, पैर छूने वाली, घूंघट में छिपी हुई पत्नी नहीं चाहिए, बल्कि उच्च मानसिकता, बौद्धिक तथा सामाजिक स्तर पर उसका साथ देने वाली पत्नी चाहिए। पुरुष की इस मानसिकता को महिला ने भलीभांति समझा है और वह उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चल पड़ी है। केवल चल ही नहीं रही है, बल्कि दौड़ रही है।
आधुनिक प्रगतिशील भारत की इस सकारात्मक ऊर्जा से भरी दौड़ में भाग लेते हुए यदि आज की महिला कुछ क्षण को ठहरती है, तो एक दूसरा ही सच उसके सामने आता है वह है- पुरुष प्रधान समाज का सच। इस समाज में आज भी नारी को दोयम दर्जे का समझकर हाशिए पर रखा जाता है। आज महिला कितनी भी तरक्की क्यों न कर ले, उसे पुरुष के अहं को झेलना ही पड़ता है।
आदिकाल से लेकर अब तक पुरुष ने स्वयं को साबित करने के लिए बल का प्रयोग किया है। महिला उत्थान में उसे अपना पतन नजर आता है। वह महिला को बढ़ते हुए तो देख सकता है, लेकिन स्वयं से आगे बढ़ते हुए कभी नहीं। जहाँ महिला प्रगति करते हुए सफलता के नए आयाम स्थापित करती है, वहीं पुरुष का अहंकार जाग उठता है और वह अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय देते हुए उसमें दोष खोजना शुरू कर देता है।
यहीं से शुरुआत होती है- महिला असुरक्षा की। महिला सुरक्षा का मजबूत आवरण धीरे-धीरे तार-तार होने लगता है। परिणाम हमारे सामने है - रोज अखबार का मुखपृष्ठ हत्या, बलात्कार, लूट, छेड़छाड़ आदि समाचारों से भरा रहता है। आखिर सकारात्मक सोच के साथ पूरे जोश और उत्साह से दौड़ने वाला महिला समुदाय इन शीर्षकों का अधिकारी क्यों ? महिलाएँ असुरक्षा के आवरण में कैद क्यों ? क्यों हम रोज एक नए नाम के साथ समाज को शर्मसार करने वाली घटनाओं के पाठक बनते हैं ? क्या हम रोज-रोज के इन किस्सों को पढ़कर ऊबे नहीं हैं ? क्यों हमारी विकास यात्रा दूसरे अर्थों में हमें विनाश की ओर ले जाती है ? ऐसा नहीं है कि अखबारों में महिलाओं पर नकारात्मक खबरें ही आती हैं, पहले कॉलम में अक्सर महिलाओं की उपलब्धियों वाली खबरें होती हैं, पर वे इतनी छोटी होती हैं कि उस पर पाठकों की नजरें नहीं जाती, यदि चली भी जाएँ, तो वह उसे अनदेखा कर देता है।
नारी असुरक्षित क्यों ? - नारी ममता, सहिष्णुता, प्रेम और त्याग की मूर्ति है। नारी का यह गुणगान समाज द्वारा ही किया जाता है और उसकी आड़ में उसे प्रताडित भी किया जाता है। एक तरफ उसे देवी की संज्ञा दी जाती है और दूसरी तरफ उसके साथ जानवर से भी बद्तर व्यवहार किया जाता है। अरे! नारी कोई देवी नहीं है, न ही पशु और न ही कोई वस्तु है वह तो केवल एक जीते-जागते इंसान का प्रतिरूप है और इसे इंसान ही रहने दिया जाए, यही इस समाज का बड़प्पन होगा, लेकिन क्या ऐसा होता है ? नहीं। बिलकुल नहीं।
सवाल यह है कि

  •  जिस समाज में नारी देवी है वहाँ पुरुष देवता क्यों नहीं बन सकता ?
  •  नारी ममता की मूर्ति है तो पुरुष मानवता की मूर्ति क्यों नहीं हो सकता ?
  •  नारी त्याग कर सकती है तो पुरुष क्यों नहीं कर सकता ?

आज हमारा समाज दोहरी मानसिकता में साँसें ले रहा है। एक तरफ बिटिया के जन्म के पहले ही उसे मार डालने का षड्यंत्र रचा जाता है, तो दूसरी तरफ वर्ष में दो बार देवी के रूप में नारी को पूजा भी जाता है। एक नन्हीं सी जान को कोख से गोद तक का सफर भी तय करने नहीं दिया जाता। शर्म की बात तो यह है कि इस सफर में अवरोध उत्पन्न करने वाली भी एक नहीं कई महिलाएँ होती है। परम्पराओं से जकड़े परिवारों में महिलाएँ हर रूप में असुरिक्षत ही रहती हैं। बेटी की सुरक्षा विवाह से पूर्व भी और बाद में भी पल-पल नारी को डराती है। अपराध न होते हुए भी नारी अपमानित होती है और उसके साथ पूरे परिवार का आत्मसम्मान जुड़ जाता है। इस मान-अपमान की भावना ने समाज में अपनी जड़ें इतनी मजबूत कर ली हंै कि हम युगों से इसे सत्य मानते आ रहे हैं और नारी स्वयं को असुरक्षित।
शिक्षित और आधुनिक होने का दम भरने वाला हमारा समाज अपने आपको सभ्य और विकसित मानता है लेकिन इसी समाज में नारी शोषण और हिंसा बढ़ती जा रही है। क्रूरता की हदें पार हो रही हैं। नारी असुरक्षा का मुख्य कारण यही है कि आज कोई सशक्त कानून नहीं है। जो कानून है भी तो उस पर अमल नहीं होता। अपराधियों को उचित दंड नहीं दिया जाता। कोई सुनवाई नहीं होती। और ये सब हो भी कैसे सकता है क्योंकि

  • कानून बनाने वाले हैं पुरुष!
  • कानून लागू करने वाले हैं पुरुष!
  • कानून के दायरे में रहकर अपराधी को दंड देने वाले हैं पुरुष!
  • और अपराधी को छोड़ने वाले भी हैं पुरुष!!

फिर भला इन पुरुषों के बीच नारी सुरक्षित रह पाएगी?
लेकिन दोषी केवल पुरुष वर्ग ही नहीं है। जब महिला को स्वतंत्रता का उपहार दिया जा रहा था तो उसने अपनी इच्छा से ही स्वच्छंदता को भी स्वीकार कर लिया। उसने स्वतंत्रता को ही स्वच्छंदता मान लिया, इसलिए वह अपनी ही सीमाओं से बाहर जाने लगी। इसी के दुष्परिणाम के रूप में समाज का वह सच सामने आया, जिसे हम नारी उत्पीड़न कहते हैं। वास्तव में नारी पर हो रहे अत्याचार में केवल पुरुष वर्ग ही दोषी नहीं है, बल्कि लक्ष्मण रेखा लाँघने वाली नारी भी दोषी है।
महिला अपनी सुरक्षा किस प्रकार करे -
महिला की सुरक्षा के लिए सबसे पहले तो स्वयं महिला को ही आगे आना होगा। बचपन से ही उसके दिमाग में यह मानसिकता भरी जाती है कि पुरुष स्त्री से श्रेष्ठ है और अफसोस तो यह है कि इस बात को भरने वाली एक स्त्री ही होती है। जिस दिन नारी ही नारी की दुश्मन होना छोड़ देगी नारी भी अपनी रूढ़ियों और परम्पराओं के बंधनों को तोड़कर वैसे ही आजाद हो जाएगी जैसे उन्मुक्त आकाश में उड़ता पंछी।
भारतीय समाज में नारी उत्थान और सुरक्षा का दायित्व केवल पुलिसबल और सरकार का ही नहीं है। भारत में ऐसी कई निजी संस्थाएँ भी हैं, जो इस उद्देश्य हेतु कार्यरत हैं, परंतु इतने बड़े महिला समुदाय का विकास एवं सुरक्षा केवल कोई संस्था या पुलिस बल या अकेली सरकार के हाथों संभव नहीं है। इसके लिए स्वयं महिला को ही प्रयास करने होंगे। इसके अलावा पुरुष वर्ग को भी इसमें सहयोग देना होगा। केवल काली, दुर्गा या शक्ति की उपमाओं से सुशोभित होकर सुरक्षित नहीं रहा जा सकता, बल्कि इनका पर्याय बनने के लिए व्यावहारिक भी होना होगा। कई ऐसी जूड़ों, कराटे, स्व-सुरक्षा की कक्षाएँ चलती हैं जिनमें ट्रेनिंग लेकर स्वयं को सिद्ध करना होगा।
नारी को तो जन्म से लेकर मृत्यु तक संघर्ष का सफर तय करना है। उसके लिए हर दिन, हर घड़ी, हर समय, हर साल, हर उम्र में परीक्षा की घड़ी होती है। जिससे मुकाबला करके उसे हर कदम आगे ही आगे चलना होगा। हर परीक्षा को पार करके उसे अपने जीवन की इस यात्रा को समाज, परिवार में सार्थक बनाना होगा। भारतीय दर्शन नारी को देवी मानता है। देवी के रूप मंे मंदिर में स्थान देता है, पर आम जीवन में उसके साथ विषमताएँ देखी जाती है। उसे इन विषमताओं से जूझना होगा। कदम-कदम पर समझौते और संघर्ष दोनों करने होंगे। भारतीय नारी में सहनशीलता कूट-कूट कर भरी होती है। जिसके कारण वह हमेशा लाचारी का मुकुट अपने सिर पर पहनती है। उसे इस काँटों भरे ताज को फेंककर स्वाभिमान का ताज पहनना होगा। इसके लिए केवल और केवल स्वयं को ही सक्षम बनाने की आवश्यकता है।
अब यह कहने का समय नहीं है कि नारी तुम केवल श्रद्धा हो, अब यह भी नहीं कहा जा सकता कि नारी तुम केवल घर का ही गहना हो। आज नारी समाज का एक आवश्यक अंग है। परिवार की गाड़ी को चलाने वाली दूसरे पहिए के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कर रही है। कई क्षेत्रों में उसने पुरुषों को मात भी दी है। नारी के पास आज घर ओर बाहर की जिम्मेदारी भी है, जिसे वह कुशलतापूर्वक निभा रही है। अपनी सुरक्षा को लेकर भी वह सचेत है। यदा-कदा हम नारी गौरव के किस्से भी सुनते ही रहते हैं। पर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि आज नारियों पर अत्याचारों में पहले से अधिक बढ़ोत्तरी हुई है। यहाँ यह देखना आवश्यक है कि नारी अत्याचार में क्या केवल पुरुष वर्ग ही शामिल है? इस पर गहराई से अध्ययन किया जाए तो आज नारी पर होने वाले अत्याचारों में यह सामने आया है कि पुरुष को अत्याचार करने के लिए उकसाने वाली नारी ही है। ऐसे में उसकी अस्मिता पर सवाल उठ खड़ा होता है। रसोई से लेकर आफिस तक वह यदि प्रताड़ित है, तो इसके लिए कहीं न कहीं उसका व्यवहार भी दोषी है। संयम का पाठ नारी ही सिखाती है, यदि वही संयम का तटबंध तोड़ने लगे, तो फिर विश्वास किस पर किया जाए? विश्वास स्वयं नारी के भीतर है। उसे जगाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
एक कदम तो तुम बढ़ाओ
बाकी के कदम बढ़ते चले जाएँगे
तुम पा लोगे अपने हिस्से का आसमाँ
तारे हथेलियों में समा जाएँगे।
भारती परिमल

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.