अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

1:56 pm
कविता का कुछ अंश... इस बार इस बार जब आएगी वो अपनी भीगी आँखें लेकर झरती बूँदों की गरमाहट अपनी हथेली पर नहीं महसूस करूँगी मैं चुनौती दूँगी उसे गरमाहट को लावा बना देने की। इस बार जब आएगी वो बहता लहू और गहरी चोट लेकर नहीं लगाऊँगी कोई मरहम नहीं निकलेगी मुँह से आह वो खुद ही भरेगी अपने गहरे ज़ख्म इस बार जब आएगी वो लोगों के फिकरे-ताने लेकर नहीं दूँगी किसी का जवाब सवाल फेंकती निगाहें भी नहीं उठाऊँगी उसकी ओर मौन रहकर ही तैयार करूँगी उसे लोगों को लाजवाब करने के लिए इस बार तय कर लिया है नहीं बनाऊँगी उसे कमज़ोर सामना करना है उसे हर दर-ओ-दीवार का हर अनाचार-अत्याचार का इस समाज और संसार का अंतर समझ आना ही चाहिए पान की पीक और लहू का खिलखिलाहट और अट्टहास का सुमधुर बोली और विभत्स वाणी का स्नेहासिक्त और वासनामयी दृष्टि का इस अंतर को समझाने के लिए हर सच्चाई अनुभव करवाने के लिए मैं नहीं रहूँगी उम्र के हर मोड़ पर साथ उसे थामना होगा अपना ही हाथ क्योंकि - अब बिटिया बड़ी हो रही है... अन्य कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.