अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

4:00 pm
कभी कभी खुद से बात करो, कभी खुद से बोलो । अपनी नज़र में तुम क्या हो? ये मन की तराजू पर तोलो । कभी कभी खुद से बात करो । कभी कभी खुद से बोलो । हरदम तुम बैठे ना रहो - शौहरत की इमारत में । कभी कभी खुद को पेश करो आत्मा की अदालत में । केवल अपनी कीर्ति न देखो- कमियों को भी टटोलो । कभी कभी खुद से बात करो । कभी कभी खुद से बोलो । दुनिया कहती कीर्ति कमा के, तुम हो बड़े सुखी । मगर तुम्हारे आडम्बर से, हम हैं बड़े दु:खी । कभी तो अपने श्रव्य-भवन की बंद खिड़कियाँ खोलो । कभी कभी खुद से बात करो । कभी कभी खुद से बोलो । ओ नभ में उड़ने वालो, जरा धरती पर आओ । अपनी पुरानी सरल-सादगी फिर से अपनाओ । तुम संतो की तपोभूमि पर मत अभिमान में डालो । अपनी नजर में तुम क्या हो? ये मन की तराजू में तोलो । कभी कभी खुद से बात करो । कभी कभी खुद से बोलो । इसी कविता को ऑडियो के माध्यम से सुनिए...

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.