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एक था बेटा। एक थी बेटी। दोनों खेलते आँगन में। आँगन में था पेड़। पेड़ पर थे पत्ते। पत्तों में था घोंसला। घोंसले में थे बच्चे। बच्चे चिड़िया के। चिड़िया की थी चहक। बच्चों की थी चें-चें। पत्तों की थी नाक। नाक से पत्ते लेते थे साँस। साँसों में बसा था हरापन। हरेपन में था पानी। पानी से था जीवन। जीवन की थी कहानी। कहानी से बना था संसार। संसार में था सूरज। सूरज में थी आग। आग में था ताप। ताप से थी गरमाहट। गरमी में थी धड़कन। धड़कनों की भी भाषा। भाषा में थे शब्द। शब्द टपके थे वृक्ष से। आँधी चली। वृक्ष उखड़ा। कुल्हाड़ी चली। वृक्ष कटा। पंछी उड़े। बच्चे भागे। पत्ते सूखे। आँखों का पानी सूखा। होठों की बानी सूखी। हरापन टूटा। आँगन मैदान हुआ। छाया गुमी। चेंचें बरबाद हुई। कलरव के घाट सूने हुए। रिश्तों की नदी में पत्थर उभरे। तह की काई सतह पर आई। बेटा-बेटी की भाषा खो गयी। भाषा की संस्कृति की रोटी को कागला ले उड़ा। क्या रोना निर्जीव की मौत पर? निर्जीव के नाश पर। छाया के विनाश पर। रोने के और भी हैं कितने बहाने। फिर वृक्ष पर ही इतना दर्द क्यों उड़ेलना? वृक्ष की मौत से दुनिया को क्यों परेशान करते हो? प्रकृति के अस्तित्व-विनाश पर इतने हैरान क्यों होते हो? अरे राजा नहीं रहा। रानी नहीं रही। वृक्ष नहीं रहा। पानी नहीं रहा। चीज़ें नाशवान हैं। नष्ट होंगी ही। पेड़ उगा है, तो उखड़ेगा ही। उदास होना बेकार है। रोना नादानी है। दुनिया अपने रस्ते चली जा रही है। वह ऐसी ही और ऐसी ही गति से जाती रहेगी। बम मत मारो। ज़मीन आसमान में धमाल मत मचाओ। कैसे न रोयें? क्यों न उदास हों। वृक्ष कटता है तो भाषा की एक संस्कृति नष्ट होती है। शब्द ख़त्म होते हैं। एक वृक्ष से कितने शब्द बने हैं। एक जंगल से भाषा कितने-कितने स्रोतों से समृद्ध होती है। एक शब्द के आने से भाषा-संस्कृति में कितनी तरह की महक भर जाती है। एक वसंत प्रकृति की चित्रकला में कितने-कितने रंगों के कलशे भर देता है। एक वृक्ष अपने में जंगल, शरद, वसंत, सब कुछ छुपाए रहता है। वृक्ष का टूटना, भाषा की गली का बंद होना है। एक पगडंडी का मिट जाना है। एक पनघट का उजड़ जाना है। एक कुंए का सूख जाना है। एक रिश्ते का खत्म हो जाना है। एक कम्प्यूटर की फ्लापी धुल जाना है। दुनिया के नक्शे से एक भरे-पूरे देश का गायब हो जाना है। बड़े दुःख की बात तो यह कि एक नन्ही चिड़िया की दुनिया का शून्य हो जाना है।

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