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कविता का कुछ अंश... फड़फड़ाते हैं वक्त के परिंदे, जी चाहता है, दूर-अति दूर, आकाश में दौड़ लगाऊँ, देखूँ ये धरती, समुद्र, व उसका रचा संसार, क्यूँ बाँध रखा है खुद को मैंने, इक कमरे की चारदीवारी में, रोकता भी कोई नहीं, परन्तु इक मजबूरी, तेरी मासूम सी सूरत, रोकती है मुझे, बंधी हूँ तुझसे, किन धागों से दिखते भी नहीं टूटते भी नहीं पर नहीं जाने देते मुझे तुझसे दूर। ऑडियो की मदद से शबनम शर्मा की कविताओं का आनंद लीजिए...

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