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बावला-बावली - कहानी का अंश... एक था बावला, एक थी बावली। दिन भर लकड़ी काटने के बाद थका-मादा बावला शाम को घर पहुंचा और उसने बावली से कहा, "बावली! आज तो मैं थककर चूर-चूर हो गया हूं। अगर तुम मेरे लिए पानी गरम कर दो, तो मैं नहा लूं, गरम पानी से पैर सेक लूं और अपनी थकान उतार लूं।" बावली बोली, "वाह, यह तो मैं खुशी-खुशी कर दूंगी। देखो, वह हंडा पड़ा है। उसे उठा लाओ। बावले ने हंडा उठाया और पूछा, "अब क्या करूं?" बावले बोली, "अब पास के कुंए से इसमें पानी भर लाओ।" बावला पानी भरकर ले आया। फिर पूछा, "अब क्या करूं?" बावली बोली, "अब हंडे को चूल्हे पर रख दो।" बावले ने हंडा चूल्हे पर रख दिया और पूछा, "अब क्या करूं?" बावली बोली, "अब लकड़ी सुलगा लो।" बावले ने लकड़ी सुलगा ली और पूछा, "अब क्या कर1ं?" बावली बोली, "बस, अब चूल्हा फूंकते रहो। बावले ने फूंक-फूंककर चूल्हा जला लिया और पूछा, "अब क्या करूं?" बावली बोली, "अब हंडा नीचे उतार लो।" इस तरह बावली अपने बावले से एक-एक कर सारे काम करवाती रही। आगे क्या हुआ, ये जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

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