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खड़बड़-खड़बड़ खोदत है - कहानी का अंश... एक ब्राह्मण था। बड़ा ही ग़रीब था। एक बार उसकी घरवाली ने उससे कहा, "अच्छा हो, आप कोई काम-धन्धा शुरू करें। अब तो बच्चों को कभी-कभी भूखे सोना पड़ता है।" ब्राह्मण बोला, "लेकिन मैं करूं क्या? मुझे तो कुछ भी नहीं आता। कोई रास्ता सुझाओ।" ब्राह्मणी पढ़ी-लिखी और समझदार थी। उसने कहा, "सुनिए, यह एक श्लोक में आपको रटवाये देती हूं। आप इसे किसी राजा को सुनायंगे, तो सुन सुनकर वह आपको कुछ पैसा जरूर देंगे। श्लोक भूलिए मत।" ब्राह्मणी ने ब्राह्मण को श्लोक याद करवा दिया। ब्राह्मण श्लोक बोलता-बोलता दूर की यात्रा पर निकल पड़ा। रास्ते में नदी मिली। नहाने-धोने और खाने-पीने के लिए ब्राह्मण वहां रूक गया। जब उसका मन नहाने-धोने में लगा,तो वह अपनी घरवाली का सिखाया हुआ श्लोक भूल गया। वह श्लोक को याद करने लगा, पर कुछ भी याद नहीं आया। इसी बीच उसने देखा कि एक जल-मुर्गी नदी-किनारे कुछ खोद रही है। श्लोक को याद करते-करते जब उस जलमुर्गी को खोदते देखा, तो उसके मन में एक नया चरण उजागर हुआ। वह बोलने लगा: खड़बड़-खड़बड़ खोदत है। जब ब्राह्मण ‘खड़बड़-खड़बड़ खोदत है’ बोलने लगा, तो उसकी आवाज सुनकर जलमुर्गी अपनी गरदन लम्बी करके देखने लगी। यह देखकर ब्राह्मण के मन में दूसरा चरण उभरा। वह बोला: लम्बी गरदन देखत है। ब्राह्मण जब दूसरी बार बोला, तो जलमुर्गी मारे डर के चुपचाप छिप गई। यह देखकर ब्राह्मण के मन में तीसरा चरण जन्मा। उसने कहा: उकड़ू मुकडू बैठत है। ब्राह्मण की आवाज़ सुनकर जलमुर्गी तेजी से दौड़ी और पानी में कूद पड़ी। इस दूश्य को देखकर ब्राह्मण के मन में चौथा चरण उठा। वह बोला: सरसर सरसर दौड़त है। ब्राह्मण पहला श्लोक तो भूल चुका था, पर अब उसे यह नया श्लोक याद हो गया था। यह मानकर कि यही श्लोक उसे सिखाया गया है, इस श्लोक को दोहराता वह आगे बढ़ा: खड़बड़-खड़बड़ खोदत है। लम्बी गरदन देखत है। उकड़ू मुकड़ू बैठत है। सरसर सरसर दौड़त है। चलते चलते वह एक नगर में पहुंचा। वह नगर के राजा के दरबार में गया और सभा में जाकर उसने अपना श्लोक सुना दिया। श्लोक सुनाने के बाद क्या हुआ, क्या राजा ने उसे ईनाम दिया, या दरबार से बाहर निकाल दिया, सभी दरबारियों की क्या प्रतिक्रिया हुई, ये सभी जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

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