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कहानी का अंश... मास्‍टर चंद्रभान पांडे ने देखा कि वह आदमी कोई और नहीं, उसके इलाके के एमएलए जंगबहादुर यादव हैं। उनकी आँँखें शम्र से झुक गई और झुकी हुई आँँखें धोती के बड़े-बड़े सुराखों में उलझ गई। यादव जी ने ठहाका लगाया - अरे मास्‍टर साहब आप। आपने अब ये धंधा भी शुरू कर दिया है। ठीक है, आदमी को कुछ न कुछ करते रहना चाहिए। पैसा बड़ी चीज है। मेरे लायक कोर्इ काम हो तो जरूर कहिएगा। फिर एक ठहाका लगाया1 उसके दोस्‍तों ने भी उनका अनुसरण किया। एक ने खुशामद के तौर पर कहा - अरे यादवजी, आपकी बदौलत जब इस इलाके में सड़क बन रही है, तो कितनों का पेट पल जाएगा। यादव जी ने पांच रूपए का नोट निकाला और मास्‍टर साहब की ओर बढ़ा दिया। मेरे पास खुल्‍ले पैसे नहीं हैं। - मास्‍टर जी ने कहा। अरे तो रख लीजिए ना, कौन आपसे वापस मांग रहा है। नहीं, मैं पैसे लेने का अधिकारी नहीं हूं। आपने चाय भी तो नहीं पी है। अरे तो चाय के पैसे कौन दे रहा हे, आप तो गुरूदक्षिणा समझ कर ही रख लीजिए। यादव जी अपने दोस्‍तों के साथ फुर्र से जीप में बैठकर चले गए और मास्‍टर जी अपमान का घूंट पीकर रह गए। क्‍या यही दिन देखने को बाकी रह गए हैं। अब जीना ही कितना है, फिर भी यह गरीबी का समय तो गुजारना ही है। मास्‍टर जी फटी धोती को देखते हुए भीगी आँखों से सोच रहे थे। आगे क्‍या हुआ, जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

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