अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

4:04 pm
कविता का अंश... लाशें बोलेंगी..? कुछ नहीं होगा हमसे, क्योंकि .. अब जिन्दा चुप रहेंगे और लाशें बोलेंगी / चिल्लायेंगे गिद्ध और कौवे कुत्ते और भेड़िये नोचेंगे जिन्दा /लाशों को गीदड़ भागेंगे, उल्टे पैर गाँवो की ओर मेमने रोएंगे , शेर मिमियांएंगे , बुद्धि कसमसाएगी , चालाकी फुसफुसाएगी अहिंसा सकपकाएगी ,शांति बिलबिलाएगी, अब प्रतिहिंसा फिर हिनहिनाएगी शोलों पे जमीं राख अब खुद ब खुद उड़ जाएगी . गुम्बदों के गुबार , छा जाएंगे दिलों पर अंधेरा रातों का , मिट जाएगा आतिशबाजी में बहरे भी सुन सकेंगे,सब धमाके अब संवेदनाएं मर जाएंगी शुभकामनाएं सड़ जाएंगी रिश्ते के धागे पड़ने लगेंगे छोटे उम्मीदों की पतंगे कटती जाएंगी नगाड़ों के शोर भले ही थम जाएं पर नहीं जन्मेगी शांति मौन, वाचालों पर भारी होगा नौटंकियां बन्द होंगी और मुर्दों को जीने का हक नहीं होगा आगे की कविता एवं अन्य कविता ऑडियो की मदद से सुनिए...

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.