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4:50 pm
कहानी का अंश... मैं छत पर बैठी थी,सर्दियों की गुनगुनाती धूप में | अचानक मेरी नज़र उस अकेली बैठी लड़की पर गई ; आश्चर्य इसलिए हो रहा था क्योंकि कुछ लडकियाँ वहाँ पर हँसी मजाक में तल्लीन थी | यह लड़की अकेली गुमसुम निर्विकार किसी से कोई सरोकार नहीं ; चुपचाप बैठी थी | उस लड़की में मेरी जिज्ञासा बढ़ी | मैं छत से नीचे उतर आई | चाय बनाकर चुस्कियाँ लेने लगी | दिमाग में उसी लड़की की छवि घूम रही थी | मैं उसे झटक देना चाहती थी किन्तु वह मुझपर हावी होती जा रही थी | खैर समय सरक रहा था | हमेशा की भांति, तैयार होकर बाजार में सामान खरीदने गई | घर का थोडा सामान लिया | दो घंटे कैसे गुजरे पता ही नहीं चला , इन दो घंटों में उस लड़की का याद न आना मुझे चकित कर गया | सच में इंसान कितनी जल्दी चीजों को भूल जाता है | मुझे याद आता है वो दिन जब पिताजी का देहांत हुआ और हम चीख-चीख कर रो रहे थे | ये क्या बिलकुल तीन चार दिन के बाद माहौल हलका फुल्का होने लगा | मैं सोचती हूँ यदि ईश्वर इंसान को विस्मृति न देता तो इंसान दुखों को कहाँ तक ढोता फिरता | ये क्या आज मैं उस लड़की को फिर से देख रही हूँ | ठीक वैसे ही अकेली | आज वह बाजार में कुछ खरीद रही थी या देख रही थी , पता नहीं | मैंने अपनी जरुरत का सामान लिया और रिक्शा को आवाज देने लगी | ये क्या वह भी बिलकुल मेरे समीप आ गई और कहने लगी "क्या मैं भी आपके साथ आ सकती हूँ |" मैंने कहा "हाँ मुझे कोई आपत्ति नहीं , लेकिन क्या तुम मुझे जानती हो |" उसने कहा "हाँ , आप हमारे मोहल्ले में तो रहती है |" मैंने रिक्शा किया उसे बिठाया और रिक्शे वाले को पता बताकर मैं भी बैठ गई | मेरे मन में प्रश्न घूम रहा था और मैंने पूछ ही लिया - "मैंने तो तुम्हे छत से एक बार ही देखा था , लेकिन तुम मुझे कैसे जानती हो |" उसने कहा "मैं मेरे कमरे की खिड़की से आपको रोज देखती हूँ |" मैंने पूछा " अच्छा वो जो लड़कियाँ खेलती रहती है तुम्हारी बहने हैं |" उसने संक्षिप्त उत्तर दिया "नहीं" मैंने पूछा " तुम्हारी इच्छा नहीं होती उनके साथ खेलने की |" इसके आगे की कहानी जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

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