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कविता का अंश... ये लड़की जो हाथ में साइकिल पकड़े मेरी आँखों के सामने खड़ी है ये लड़की जो इतनी ख़ूबसूरत है कि ख़ुदा भी पछताया होगा इसे ज़मीं पे भेजके कि रख लिया होता इसे जन्नतुल-फ़िरदौस में ही ये लड़की जिसकी आँखों में ज़िन्दगी की ताज़ा झलक है ये लड़की जिसकी न जाने क्यूँ झुकती नहीं पलक है ये लड़की जो एकटक मुझे देखे जा रही है ये लड़की जो पता नहीं क्यूँ मुस्कुरा रही है मैं सोचता हूँ हिम्मत करूँ और कह दूँ लेकिन क्या? किस अल्फ़ाज़ से अपनी बात शुरू करूँ क्या इसे ख़ूबसूरत कहूँ? नहीं ख़ूबसूरत कहना ठीक न होगा ये तो ख़ूबसूरत से कहीं बढ़के है क्या है? मुझे नहीं पता लेकिन कुछ है जिससे नज़र हटाने का मन नहीं करता लेकिन ऐसे कब तक देखता रहूँगा? कुछ तो कहना होगा कुछ तो सुनना होगा कि उसके मन में क्या है अपने मन का तो मुझे पता है क्या पता उसके मन में कुछ और हो लेकिन क्या पता उसका मन ख़ाली हो खुले आसमान की तरह और वहाँ जगह ही जगह हो मेरे लिए... आगे की कविता ऑडियो की मदद से सुनिए...

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