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कविता का अंश... हम सब का अस्तित्व गुज़र चुकी चीज़ें नहीं सोचतीं अपने होने के बारे में न वे याद रखती हैं कि अब वे नहीं हैं वे बस थीं समय की टिक टिक से परे जिस तरह प्रेम याद करने को कुछ भी तो नहीं है हवा पीछे पलटे बिना चुपचाप बह रही है फूल निरन्तर खिल रहे हैं चिड़िया अपनी उड़ानों के बाद कहाँ देख पाती है अपने पीछे के आसमानों की लम्बाई मैं इस सबसे आहिस्ते आहिस्ते गुज़र गयी जिसके बीच में मुझे रोपित कर दिया गया था उसी शाख पर खिली मैं जिस पर प्रक्रति ने उगाया था और फूल कर पक कर तोड़ ली गयी वे सारे मौसम मुझ पर से गुज़र गए शाख मेरा ‌बोझ संभाले खड़ी रही चुपचाप हम सब का अस्तित्व एक और अस्तित्व को पोषित करने में है कही यही बात नदी ने चुपके से कानों में मेरे सागर में विलीन होने से पहले ....... ऐसी ही अन्य मर्मस्पर्शी कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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