मंगलवार, 28 जून 2016

गीजूभाई की बाल कहानी - ओ रे बेदर्दी...

कहानी का अंश... एक था कुनबी और एक थी कुनबिन। एक दिन जब कुनबी खेत से लौटकर घर आया और अपनी थकान उतार रहा था तो कुनबिन ने कहा कि देखो मेरे माता-पिता के गाँव में अकाल पड़ा है। तुम वहाँ जाकर उनकी मदद के लिए गेहूँ और एक गाय ले जाओ। कुनबी बैलगाड़ी में सामान लेकर तो जाता है पर वह अपनी ससुराल न पहुँचकर कहीं और वह सामान दे देता है। उसका बेटा घर आकर यह बात माँ को बता देता है और फिर कुनबिन अपने पति कुनबी को सबक सिखाने के लिए नई चाल चलती है। सामान किसके पास पहुँचता है अौर कुनबिन क्या चाल चलती है? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

पंचतंत्र की कहानियाँ - 24 - मित्र की सलाह

कहानी का अंश... एक धोबी का गधा था। वह दिन भर कपडों के गट्ठर इधर से उधर ढोने में लगा रहता। धोबी स्वयं कंजूस और निर्दयी था। अपने गधे के लिए चारे का प्रबंध नहीं करता था। बस रात को चरने के लिए खुला छोड देता। निकट में कोई चरागाह भी नहीं थी। शरीर से गधा बहुत दुर्बल हो गया था। एक रात उस गधे की मुलाकात एक गीदड़ से हुई। गीदड़ ने उससे पूछा 'कहिए महाशय, आप इतने कमज़ोर क्यों हैं?' गधे ने दुखी स्वर में बताया कि कैसे उसे दिन भर काम करना पडता है। खाने को कुछ नहीं दिया जाता। रात को अंधेरे में इधर-उधर मुँह मारना पडता है। गीदड़ बोला 'तो समझो अब आपकी भुखमरी के दिन गए। यहां पास में ही एक बडा सब्जियों का बाग़ है। वहां तरह-तरह की सब्जियाँ उगी हुई हैं। खीरे, ककडियां, तोरई, गाजर, मूली, शलजम और बैंगनों की बहार है। मैंने बाग़ तोडकर एक जगह अंदर घुसने का गुप्त मार्ग बना रखा है। बस वहां से हर रात अंदर घुसकर छककर खाता हूं और सेहत बना रहा हूं। तुम भी मेरे साथ आया करो।' लार टपकाता गधा गीदड़ के साथ हो गया। बाग़ में घुसकर गधे ने महीनों के बाद पहली बार भरपेट खाना खाया। दोनों रात भर बाग़ में ही रहे और पौ फटने से पहले गीदड़ जंगल की ओर चला गया और गधा अपने धोबी के पास आ गया। उसके बाद वे रोज रात को एक जगह मिलते। बाग़ में घुसते और जी भरकर खाते। धीरे-धीरे गधे का शरीर भरने लगा। उसके बालों में चमक आने लगी और चाल में मस्ती आ गई। वह भुखमरी के दिन बिल्कुल भूल गया। एक रात खूब खाने के बाद गधे की तबीयत अच्छी तरह हरी हो गई। वह झूमने लगा और अपना मुंह ऊपर उठाकर कान फडफडाने लगा। गीदड़ ने चिंतित होकर पूछा 'मित्र, यह क्या कर रहे हो? तुम्हारी तबीयत तो ठीक हैं?' गधा आंखें बंद करके मस्त स्वर में बोला 'मेरा दिल गाने का कर रहा हैं। अच्छा भोजन करने के बाद गाना चाहिए। सोच रहा हूं कि ढैंचू राग गाऊं।' गीदड़ ने तुरंत चेतावनी दी 'न-न, ऐसा न करना गधे भाई। गाने-वाने का चक्कर मत चलाओ। यह मत भूलो कि हम दोनों यहां चोरी कर रहे हैं। मुसीबत को न्यौता मत दो।' गधे ने टेढी नजर से गीदड़ को देखा और बोला 'गीदड़ भाई, तुम जंगली के जंगली रहे। संगीत के बारे में तुम क्या जानो?' गीदड़ ने हाथ जोडे 'मैं संगीत के बारे में कुछ नहीं जानता। केवल अपनी जान बचाना जानता हूं। तुम अपना बेसुरा राग अलापने की ज़िद छोडो, उसी में हम दोनों की भलाई है।'

शुक्रवार, 24 जून 2016

कविताएँ - अर्चना सिंह‘जया’

कविता का अंश... वर्षा तू कितनी भोली है, नहीं जानती कब आना है और तुझे कब जाना है? बादल तेरे संग मँडराता हवा तुम्हें बहा ले जाती। जहाँ चाहता रुक है जाता और तुम्हें है फिर बरसाता। धरती से तू दूर हो गई, मानव से क्यों रूठ गई ? अद््भुत तेरा रूप सुहाना बारिश में भींग-भींग कर गाना। कहाँ गया वह तेरा रिश्ता ? बच्चों के संग धूम मचाना। रौद्र रूप तुम दिखला कर दुनिया को अचंभित कर देती। कभी रुला देती मानव को, बूँद-बूँद को भी तरसा है देती। भू पर गिर जीवन देती तू सभी प्राणी का चित हर लेती। फिक्र औरों का तू करती। वर्षा तू कितनी भोली है। ऐसी ही अन्य कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

काले-काले आए जामुन - घनश्याम मैथिल ‘अमृत’

कविता का अंश... काले काले आए जामुन बच्चों के मन भाए जामुन हरे-भरे पत्तों के अंदर बड़े रसीले पाए जामुन। कुछ मीठे थे कुछ खट्‌टे थे, जो भी हमने खाए जामुन। आगे की कविता ऑडियो की मदद से सुनिए...

बुधवार, 22 जून 2016

बाल कहानी - छत्रपति का न्याय

कहानी का अंश... छत्रपति शिवाजी बहुत ही न्यायप्रिय शासक थे। उनके राज्य में सुख-शांति थी और अपराधी को कड़ा दंड दिया जाता था। एक बार उनके सैनिकों ने एक आदमी को चोरी करते हुए पकड़ लिया और उसे दरबार में लाया गया। बहादुर सैनिकों ने उस आदमी को पकड़ने का कारण बताते हुए कहा कि महाराज, यह आदमी गोदाम से अनाज की चोरी कर रहा था। शिवाजी ने उस आदमी से पूछा - क्या सैनिकों द्वारा लगाया गया आरोप सही है? उस आदमी ने निडरतापूर्वक कहा - जी हाँ, महाराज। मैंने चोरी की है। शिवाजी ने अचंभे से पूछज्ञ - लेकिन क्यों? उस आदमी ने प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा - महाराज, मैं कई दिनों से काम की तलाश में भटक रहा था लेकिन मुझे कहीं काम नहीं मिला। हम लोग बहुत गरीब हैं। हमारे पास खाने के लिए कुछ नहीं था। कई दिनों से अन्न का एक दाना भी हमारे मुँह में नहीं गया। महाराष्ट्र नरेश, इस संसार में मनुष्य सब कुछ सहन कर लेता है, परंतु पेट की ज्वाला को सहन करना बहुत कठिन काम है। मैं जानता था कि चोरी करना अपराध है लेकिन क्या करता? पेट की भूख मिटाने के लिए मैंने चोरी करने का निर्णय लिया। आप मुझे इसके लिए जो चाहे वो दंड दे सकते हैं। शिवाजी ने उस चोर को क्या दंड दिया होगा? क्या उसने चोरी करना छोड़ दिया होगा? ये जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

बाल कहानी - रानी चींटी

कहानी का अंश... एक था जंगल। उसमें एक घमंडी शेर रहता था। उसे अपने बल का बहुत घमंड था। अपने सामने वह जंगल के सारे प्राणियों को छोटा समझता था। एक दिन उसने घोषणा करवाई कि जंगल के सभी आदमी उसे आकर प्रणाम करें। अगले दिन एक-एक कर जंगल के सभी प्राणी उसके सामने आए और उसे प्रणाम करने लगे परंतु रानी चींटी को आने में देर हो गई। जब रानी चींटी ने आकर कारण बताया तो शेर गुस्सा हो गया और सभी के सामने उसे डाँटने लगा। बेचारी रानी चींटी उसकी डाँट सुनकर परेशान हो गई। इतने छोटे से अपराध को लेकर इतना अपमान सभी के सामने? उसने इसका बदला लेने का विचार किया। क्या किया होगा रानी चींटी ने? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

कविता - पेड़ों के संग बढ़ना सीखो - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना हिन्दी साहित्य जगत के एक ऐसे हस्ताक्षर हैं, जिनकी लेखनी से कोई विधा अछूती नहीं रही। चाहे वह कविता हो, गीत हो, नाटक हो अथवा आलेख हों। जितनी कठोरता से उन्होंने व्यवस्था में व्याप्त बुराइयों पर आक्रमण किया, उतनी ही सहजता से वे बाल साहित्य के लिये भी लेखनी चलाते रहे। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जन्म 15 सितंबर 1927 को बस्ती (उ.प्र) में हुआ। उन्होंने एंग्लो संस्कृत उच्च विद्यालय बस्ती से हाईस्कूल की परीक्षा पास कर के क्वींस कॉलेज वाराणसी में प्रवेश लिया। एम.ए की परीक्षा उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की। एक छोटे से कस्बे से अपना जीवन आरम्भ करने वाले सर्वेश्वर जी ने जिन साहित्यिक ऊचाइयों को छुआ, वो इतिहास और उदाहरण दोनो हैं। उनके काव्य सन्ग्रह "खूंटियॊं पर टंगे हुए लोग" के लिये उन्हें १९८३ में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया। काठ की घंटियाँ, बांस का पुल, गर्म हवाएँ, एक सूनी नाव, कुआनो नदी आदि उनकी प्रमुख क्रतियां हैं। आपने पत्रकारिता जगत में भी उसी जिम्मेदारी से काम किया और आपका समय हिन्दी पत्रकारिता का स्वर्णिम अध्याय माना जाता है।अध्यापन करने तथा आकाशवाणी में सहायक प्रोड्यूसर रहने के बाद वे बाल साहित्य पत्रिका "पराग" के सम्पादक रहे और "दिनमान" की टीम में अज्ञेय जी के साथ भी उन्होंने काम किया। उनकी देख रेख में हि्न्दी बाल साहित्य ने नये आयाम छुए और आज के समय में बाल साहित्य जगत उनके जैसे रचनाकारों की बड़ी कमी अनुभव करता है। यहाँ प्रस्तुत है उनकी एक कविता ऑडियो के माध्यम से... विश्वास है आपको यह अवश्य पसंद आएगी।

कविता - मिट्‌टी की महिमा - शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

कविता का अंश.... निर्मम कुम्हार की थापी से कितने रूपों में कुटी-पिटी, हर बार बिखेरी गई, किंतु मिट्टी फिर भी तो नहीं मिटी! आशा में निश्छल पल जाए, छलना में पड़ कर छल जाए सूरज दमके तो तप जाए, रजनी ठुमकी तो ढल जाए, यों तो बच्चों की गुडिया सी, भोली मिट्टी की हस्ती क्या आँधी आये तो उड़ जाए, पानी बरसे तो गल जाए! फसलें उगतीं, फसलें कटती लेकिन धरती चिर उर्वर है सौ बार बने सौ बर मिटे लेकिन धरती अविनश्वर है। मिट्टी गल जाती पर उसका विश्वास अमर हो जाता है। आगे की कविता ऑडियो की मदद से सुनिए...

मंगलवार, 21 जून 2016

बाल कहानी - मूर्खता की नदी - सुधा भार्गव

कहानी का अंश... एक लड़का था। उसका नाम था मुरली। वह वकील साहब के घर काम करता। वकील साहब ज्यादातर लाइब्रेरी में ही अपना समय बिताया करते। वहाँ छोटी-बड़ी, पतली-मोटी किताबों की भीड़ लगी थी। मुरली को किताबें बहुत पसंद थीं I मगर वह उनकी भाषा नहीं समझता था। खिसिया कर अपना सिर खुजलाने लगताI उसकी हालत देख किताबें खिलखिला कर हँसने लगतीं। एक दिन उसने वकील साहब को मोटी-सी किताब पढ़ते देखा। उनकी नाक पर चश्मा रखा था। जल्दी-जल्दी उसके पन्ने पलट रहे थे I कुछ सोच कर वह कबाड़ी की दुकान पर गया जहाँ पुरानी और सस्ती किताबें मिलती थीं। "चाचा मुझे बड़ी-सी, मोटी-सी किताब दे दो" "किताब का नाम?" "कोई भी चलेगी.... कोई भी दौड़ेगी...!" "तू अनपढ़... किताब की क्या जरूरत पड़ गईI" "पढूँगा" "पढ़ेगा...! चाचा की आँखों से हैरानी टपकने लगी!" "कैसे पढ़ेगा?" "बताऊँ..." "बता तो, तेरी खोपड़ी में क्या चल रहा हैI" "बताऊँ... बताऊँ..." मुरली धीरे से उठा, कबाड़ी की तरफ बढ़ा और उसका चश्मा खींच कर भाग गया। भागते-भागते बोला - "चाचा, चश्मा लगाने से सब पढ़ लूंगाI मेरा मालिक ऐसे ही पढ़ता है। दो-तीन दिन बाद तुम्हारा चश्मा, और किताब लौटा जाऊँगा।" आगे की कहानी जानिए ऑडियो की मदद से...

बाल कविताएँ - पूनम श्रीवास्तव

कविता का अंश... सतरंगे बादल... उमड़ घुमड़ कर आते बादल, गरज बरस कर आते बादल, काले काले भूरे पीले, कितना हमें डराते बादल। खुशियों का पैगाम ये बादल, फसलों की तो जान हैं बादल, लेकिन हद से गुजर गये तो, बन जाते हैं काल ये बादल। दूर देश से आते बादल, बारिश को संग लाते बादल, बच्चों बूढ़ों और बड़ों की, मस्ती का ही नाम हैं बादल। लाते हैं संदेशे बादल, हमें सीख ये देते बादल बूँद बूँद पानी की भर लो, जाने कब फिर बरसें बादल। इंद्रधनुष के रंग में सबको, रंग जाते हैं प्यारे बादल, जीवन के पल पल को रँग लो, सतरंगे कहते ये बादल। ऐसी ही अन्य बाल कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से प्राप्त कीजिए... यदि आपको कविताएँ अच्छी लगें तो आप कवयित्री से सीधे संपर्क कर उन्हें बधाई प्रेषित कर सकते हैं, संपर्क - फोन 08052138753 ई-मेल ladali1502@gmail.com

कहानी - अपूर्व दिशा - दिव्या माथुर

कहानी का अंश... ‘तुम ठीक कहते हो; आज सुबह उगते हुए सूर्य का वर्णन जिस प्रवरता से तुमने किया, मैं भी नहीं कर सकती थी. जानते हो मणि, मैंने अपनी आँखों पर दुपट्टा बाँध लिया था? मुझे ऐसा महसूस हुआ कि जैसे मैं एक अनोखी दुनिया में थी जो इस प्रत्यक्ष दुनिया से कहीं ज़्यादा बेहतर, कहीं अधिक खूबसूरत थी, स्वपनिल, माँ के आंचल में दुबके बच्चे सी सुरक्षित. सचमुच तुम्हारी आवाज़ में जादू है. एक क्षण तो ऐसा आया कि मैंने दुपट्टा उतार फेंका यह देखने के लिए कि क्या ऊषा सचमुच उतनी ही खूतसूरत थी किंतु लगा कि जैसे मैंने रंगीन चश्मा उतार दिया हो. तुम्हें क्या ऐसी अधीरता होती है कभी, मणि?’ शमा और मणि में कहने-सुनने पर कोई रोक न थी, वे बेझिझक अपनी बात एक दूसरे से कह सुन सकते थे और प्रत्येक शंका का समाधान, चाहे उन्हें फिर बहस में घंटों लग जाए, निकल ही आता था. ‘तुम भूल जाती हो, शम्मी, कि मैंने अपनी आँखों पर पट्टी नहीं बाँध रखी जिसे मैं जब चाहूँ उतार फेकूं.’ मणि शमा के चेहरे को टटोलते हुए बोला, ‘तुम्हें घबराहट इसलिए हुई कि तुम जानती थी तुम पट्टी उतार कर देख सकती हो. कमी तो मुझे तब महसूस हो जब दोनों दृश्य मेरे भोगे हुए हों. रही मेरे वर्णन की सजीवता की बात तो तुमने जो मेरी भाषा में रंग भरे हैं, उनसे तुम स्वयं ही प्रभावित होती रहती हो.’ ‘वाह, क्या बात कहीं है जनाब ने, दिल ख़ुश कर दिया. मैं तो क्या, तुम्हारे वे सभी श्रोतागण, जिनमें महिलाओं की संख्या पुरुषों से कहीं अधिक है, हम सभी तुम्हारी बातों के दीवाने हैं. अपनी फ़ैन-मेल का जवाब देने बैठोगे तो नानी याद आ जाएगी.’ ‘नहीं, यह काम बाद में. अब तुम आराम करोगी, समझी? ऐसी हालत में स्त्रियाँ घंटों सोती हैं और एक तुम हो कि बैठने का नाम नहीं लेतीं.’ मणि ने उसे उठने से रोक लिया और उसका सिर अपनी गोदी में रखकर उसके बाल सहलाने लगा किंतु शमा अधिक देर निश्चल रह ही नहीं पाई. ‘इटली से मौसा जी का जवाब आ गया है. तुम्हें याद है न कि पिछले महीने मैंने उनको पत्र लिखा था?’ ‘वही जिन्होंने सारे घरवालों की इच्छा के विरूद्ध अन्तर्जातीय और वह भी एक नेत्रहीन प्रोफेसर से विवाह किया था?’ ‘हाँ और जानते हो मौसा जी मौसी की तरह ही विलक्षण हैं. फिलासफी में रिसर्च कर रहे हैं; विषय भूल रही हूँ...’ ‘शम्मी, तुम्हारे परिवार में क्या अक्षमों को अपनाने की प्रथा चली आ रही है?’ ‘अब मैंने इसलिए तो यह बात शुरू नहीं की थी कि...’ आगे की कहानी ऑडियो के माध्यम से जानिए...

सोमवार, 20 जून 2016

ग़ज़ल - सैलाब था वो...

लेखिका देवी नागरानी ने ग़ज़ल - सैलाब था वो... हमें ई-मेल के माध्यम से भेजी हैं। देवी नागरानी का नाम कथा संसार में एक जाना-पहचाना नाम है। आप ब्लाॅग के माध्यम से इनकी कहानियाँ सुनते ही हैं। अब उनके द्वारा भेजी गई इस ग़ज़ल का लुत्फ उठाइए। उम्मीद है कि आपको ये ग़ज़ल जरूर पसंद आएगी। रे ब्लॉग के माध्यम

पंचतंत्र की कहानियाँ - 23 - बुद्धिमान सियार

बुद्धिमान सियार... कहानी का अंश... एक समय की बात है कि जंगल में एक शेर के पैर में काँटा चुभ गया। पंजे में जख्म हो गया और शेर के लिए दौडना असंभव हो गया। वह लंगडाकर मुश्किल से चलता। शेर के लिए तो शिकार न करने के लिए दौडना जरुरी होता है। इसलिए वह कई दिन कोई शिकार न कर पाया और भूखों मरने लगा। कहते हैं कि शेर मरा हुआ जानवर नहीं खाता, परन्तु मजबूरी में सब कुछ करना पडता हैं। लंगडा शेर किसी घायल अथवा मरे हुए जानवर की तलाश में जंगल में भटकने लगा। यहाँ भी किस्मत ने उसका साथ नहीं दिया। कहीं कुछ हाथ नहीं लगा। धीरे-धीरे पैर घसीटता हुआ वह एक गुफा के पास आ पहुँचा। गुफा गहरी और सँकरी थी, उसने उसके अंदर झांका मांद ख़ाली थी पर चारों ओर उसे इस बात के प्रमाण नजर आए कि उसमें जानवर का बसेरा हैं। उस समय वह जानवर शायद भोजन की तलाश में बाहर गया हुआ था। शेर चुपचाप दुबककर बैठ गया ताकि उसमें रहने वाला जानवर लौट आए तो वह दबोच ले। सचमुच उस गुफा में सियार रहता था, जो दिन को बाहर घूमता रहता और रात को लौट आता था। उस दिन भी सूरज डूबने के बाद वह लौट आया। सियार काफ़ी चालाक था। हर समय चौकन्ना रहता था। उसने अपनी गुफा के बाहर किसी बडे जानवर के पैरों के निशान देखे तो चौंका उसे शक हुआ कि कोई शिकारी जीव मांद में उसके शिकार की आस में घात लगाए न बठा हो। उसने अपने शक की पुष्टि के लिए सोच विचार कर एक चाल चली। गुफा के मुहाने से दूर जाकर उसने आवाज़ दी 'गुफा! ओ गुफा।' गुफा में चुप्पी छायी रही उसने फिर पुकारा 'अरी ओ गुफा, तू बोलती क्यों नहीं?' आगे की कहानी ऑडियो की मदद से जानिए...

पिता के पत्र पुत्री के नाम - 29

रामायण और महाभारत... लेख के बारे में...वेदों के जमानें के बाद काव्यों का जमाना आया। इसका यह नाम इसलिए पड़ा कि इसी जमानें में दो महाकाव्य, रामायण और महाभारत लिखे गए, जिनका हाल तुमने पढ़ा है। महाकाव्य पद्य की उस बड़ी पुस्तक को कहते हैं, जिसमें वीरों की कथा बयान की गई हो। काव्यों के जमाने में आर्य लोग उत्तरी हिंदुस्तान से विंध्‍य पहाड़ तक फैल गए थे। जैसा मैं तुमसे पहले कह चुका हूँ इस मुल्क को आर्यावर्त कहते थे। जिस सूबे को आज हम 'संयुक्त प्रदेश कहते हैं वह उस जमाने में मध्‍य प्रदेश कहलाता था, जिसका मतलब है बीच का मुल्क। बंगाल को बंग कहते थे। यहाँ एक बड़े मजे की बात लिखता हूँ जिसे जान कर तुम खुश होगी। अगर तुम हिंदुस्तान के नक्शे पर निगाह डालो और हिमालय और विंध्‍य पर्वत के बीच के हिस्से को देखो, जहाँ आर्यावर्त रहा होगा तो तुम्हें वह दूज के चाँद के आकार का मालूम होगा। इसीलिए आर्यावर्त को इंदु देश कहते थे। इंदु चाँद को कहते हैं। आर्यों को दूज के चाँद से बहुत प्रेम था। वे इस शक्ल की सभी चीजों को पवित्र समझते थे। उनके कई शहर इसी शक्ल के थे जैसे बनारस। मालूम नहीं तुमने खयाल किया है या नहीं, कि इलाहाबाद में गंगा भी दूज के चाँद की-सी हो गई है। यह तो तुम जानती ही हो कि रामायण में राम और सीता की कथा और लंका के राजा रावण के साथ उनकी लड़ाई का हाल बयान किया गया है। पहले इस कथा को वाल्मीकि ने संस्कृत में लिखा था। बाद को वही कथा बहुत-सी दूसरी भाषाओं में लिखी गई। इनमें तुलसीदास का हिंदी में लिखा हुआ रामचरितमानस सबसे मशहूर है। आगे की जानकारी ऑडियो के माध्यम से प्राप्त कीजिए...

पिता के पत्र पुत्री के नाम - 28

हिंदुस्तान के आर्य कैसे थे ?... लेख के बारे में... आर्यों को हिंदुस्तान आए बहुत जमाना हो गया। सबके सब तो एक साथ आए नहीं होंगे, उनकी फौजों पर फौजें, जाति पर जाति और कुटुम्ब पर कुटुम्ब सैकड़ों बरस तक आते रहे होंगे। सोचो कि वे किस तरह लंबे काफिलों में सफर करते हुए, गृहस्थी की सब चीजें गाड़ियों और जानवरों पर लादे हुए आए होंगे। वे आजकल के यात्रियों की तरह नहीं आए। वे फिर लौट कर जाने के लिए नहीं आए थे। वे यहाँ रहने के लिए या लड़ने और मर जाने के लिए आए थे। उनमें से ज्यादातर तो उत्तर-पश्चिम की पहाड़ियों को पार करके आए; लेकिन शायद कुछ लोग समुद्र से ईरान की खाड़ी होते हुए आए और अपने छोटे-छोटे जहाजों में सिंधू नदी तक चले गए। ये आर्य कैसे थे? हमें उनके बारे में उनकी लिखी हुई किताबों से बहुत-सी बातें मालूम होती हैं। उनमें से कुछ किताबें, जैसे वेद, शायद दुनिया की सबसे पुरानी किताबों में से हैं। ऐसा मालूम होता है कि शुरू में वे लिखी नहीं गई थीं। उन्हें लोग जबानी याद करके दूसरों को सुनाते थे। वे ऐसी सुंदर संस्कृत में लिखी हुई हैं कि उनके गाने में मजा आता है। जिस आदमी का गला अच्छा हो और वह संस्कृत भी जानता हो उसके मुँह से वेदों का पाठ सुनने में अब भी आनंद आता है। हिंदू वेदों को बहुत पवित्र समझते हैं। लेकिन 'वेद' शब्द का मतलब क्या? इसका मतलब है 'ज्ञान' और वेदों में वह सब ज्ञान जमा कर दिया गया है जो उस जमाने के ऋषियों और मुनियों ने हासिल किया था। उस जमाने में रेलगाड़ियाँ, तार और सिनेमा न थे। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उस जमाने के आदमी मूर्ख थे। कुछ लोगों का तो यह खयाल है कि पुराने जमाने में लोग जितने अक्लमंद होते थे, उतने अब नहीं होते। लेकिन चाहे वे ज्यादा अक्लमंद रहे हों या न रहे हों उन्होंने बड़े मार्के की किताबें लिखीं जो आज भी बड़े आदर से देखी जाती हैं। इसी से मालूम होता है पुराने जमाने के लोग कितने बड़े थे। आगे की जानकारी ऑडियो के माध्यम से प्राप्त कीजिए...

शुक्रवार, 17 जून 2016

कविता - जानकी के लिए - राजेश्वर वशिष्ठ

कविता का अंश...मर चुका है रावण का शरीर स्तब्ध है सारी लंका सुनसान है किले का परकोटा कहीं कोई उत्साह नहीं किसी घर में नहीं जल रहा है दिया विभीषण के घर को छोड़ कर । सागर के किनारे बैठे हैं विजयी राम विभीषण को लंका का राज्य सौंपते हुए ताकि सुबह हो सके उनका राज्याभिषेक बार-बार लक्ष्मण से पूछते हैं अपने सहयोगियों की कुशल-क्षेम चरणों के निकट बैठे हैं हनुमान ! मन में क्षुब्ध हैं लक्ष्मण कि राम क्यों नहीं लेने जाते हैं सीता को अशोक वाटिका से पर कुछ कह नहीं पाते हैं । पूरी कविता का आनंद ऑडियो की मदद से प्राप्त कीजिए...

गुरुवार, 16 जून 2016

बाल कहानी - खेत के रखवाले - उपासना बेहार

कहानी का अंश... मानपुर गाँव के पास एक बड़े से पेड़ में चिड़िया और उसका बच्चा रहते थे। वो दोनों रोज सुबह खाने की खोज में जाते और अनाज के दाने खा कर शाम तक आ जाते। एक दिन चिडि़या की तबीयत ठीक नही थी। इसलिए उसने अपने बच्चे से कहा ‘बेटा आज मेरी तबीयत अच्छी नही है। तुम्हें खाना खोजने अकेले ही जाना होगा और जब तुम खाना खा लोगे तो अपने मुंह में कुछ दाना रख कर मेरे लिए भी ले आना।’ बच्चा खाने की खोज में गाँव की तरफ उड़ चला। उड़ते-उड़ते उसे नीचे अनाज से लदा खेत दिखायी दिया। जब वो थोड़ा नीचे की ओर आया तो पाया कि एक आदमी उस खेत की रखवाली कर रहा था। बच्चा चुपचाप खेत के पास के पेड़ में बैठ कर उस आदमी के जाने का इंतजार करने लगा। बहुत देर हो गई लेकिन वह आदमी खेत से गया नही, शाम होने लगी। बच्चे को घर भी जाना था। बच्चा मन ही मन सोचता है कि ‘अब ज्यादा देर रुकना ठीक नही है, मां चिंता कर रही होगी। आज तो अनाज नही मिला। अब कल आऊंगा, घर लौटते समय रास्ते में थोड़ा बहुत जो भी अनाज मिलेगा उसे मां के लिए ले जाऊॅगां’। शाम में जब वह घर पहुँच तो मां ने उससे पूछा ‘बेटा इतनी देर कैसे हो गई?’ तब बच्चा मां को उस आदमी के बारे में बताता है। मां कहती है ‘अच्छा हुआ तुम खेत पर नही गये। ये इंसान बहुत खतरनाक होते हैं। पक्षियों को पिंजरें में कैद कर लेते हैं। तुम जितना खाना लाये हो उसे ही आज हम मिल बाँट कर खा लेते हैं। तुम उस खेत में कल चले जाना।’ आगे की कहानी ऑडियो के माध्यम से जानिए... कहानी पसंद आने पर आप लेखिका उपासना बेहार से संपर्क कर उन्हें कहानी के लिए बधाई भी प्रेषित कर सकते हैं। संपर्क - ई मेल-upasana2006@gmail.com

पिता के पत्र पुत्री के नाम - 27

आर्यों का हिंदुस्तान में आना... लेख के बारे में... अब तक हमने बहुत ही पुराने जमाने का हाल लिखा है। अब हम यह देखना चाहते हैं कि आदमी ने कैसे तरक्‍की की और क्या-क्या काम किए। उस पुराने जमाने को इतिहास के पहले का जमाना कहते हैं, क्योंकि उस जमाने का हमारे पास कोई सच्चा इतिहास नहीं है। हमें बहुत कुछ अंदाज से काम लेना पड़ता है। अब हम इतिहास के शुरू में पहुँच गए हैं। पहले हम यह देखेंगे कि हिंदुस्तान में कौन-कौन-सी बातें हुईं। हम पहले ही देख चुके हैं कि बहुत पुराने जमाने में मिस्र की तरह हिंदुस्तान में भी सभ्यता फैली हुई थी। रोजगार होता था और यहाँ के जहाज हिंदुस्तानी चीजों को मिस्र, मेसोपोटैमिया और दूसरे देशों को ले जाते थे। उस जमाने में हिंदुस्तान के रहनेवाले द्रविड़ कहलाते थे। ये वही लोग हैं जिनकी संतान आजकल दक्षिणी हिंदुस्तान में मद्रास के आसपास रहती हैं। उन द्रविड़ों पर आर्यों ने उत्तर से आ कर हमला किया, उस जमाने में मध्‍य एशिया में बेशुमार आर्य रहते होंगे। मगर वहाँ सब का गुजारा न हो सकता था इसलिए वे दूसरे मुल्कों में फैल गए। बहुत-से ईरान चले गए और बहुत-से यूनान तक और उससे भी बहुत पश्चिम तक निकल गए। हिंदुस्तान में भी उनके दल के दल कश्मीर के पहाड़ों को पार करके आए। आर्य एक मजबूत लड़नेवाली जाति थी और उसने द्रविड़ों को भगा दिया। आर्यों के रेले पर रेले उत्तर-पश्चिम से हिंदुस्तान में आए होंगे। पहले द्रविड़ों ने उन्हें रोका लेकिन जब उनकी तादाद बढ़ती ही गई तो वे द्रविड़ों के रोके न रुक सके। बहुत दिनों तक आर्य लोग उत्तर में सिर्फ अफगानिस्तान और पंजाब में रहे। तब वे और आगे बढ़े और उस हिस्से में आए जो अब संयुक्त प्रांत कहलाता है, जहाँ हम रहते हैं। वे इसी तरह बढ़ते-बढ़ते मध्‍य भारत के विंध्‍य पहाड़ तक चले गए। उस जमाने में इन पहाड़ों को पार करना मुश्किल था क्योंकि वहाँ घने जंगल थे। इसलिए एक मुद्दत तक आर्य लोग विंध्‍य पहाड़ के उत्तर तक ही रहे। बहुतों ने तो पहाड़ियों को पार कर लिया और दक्षिण में चले गए। लेकिन उनके झुंड के झुंड न जा सके इसलिए दक्षिण द्रविड़ों का ही देश बना रहा। आगे की जानकारी ऑडियो की मदद से प्राप्त कीजिए...

पंचतंत्र की कहानियाँ - 22 - बिल्ली का न्याय

बिल्ली का न्याय कहानी का अंश... एक वन में एक पेड की खोह में एक चकोर रहता था। उसी पेड के आस-पास कई पेड और थे, जिन पर फल व बीज उगते थे। उन फलों और बीजों से पेट भरकर चकोर मस्त पडा रहता। इसी प्रकार कई वर्ष बीत गए। एक दिन उडते-उडते एक और चकोर साँस लेने के लिए उस पेड की टहनी पर बैठा। दोनों में बातें हुईं। दूसरे चकोर को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि वह केवल वह केवल पेडों के फल व बीज चुगकर जीवन गुजार रहा था। दूसरे ने उसे बताया- 'भई, दुनिया में खाने के लिए केवल फल और बीज ही नहीं होते और भी कई स्वादिष्ट चीज़ें हैं। उन्हें भी खाना चाहिए। खेतों में उगने वाले अनाज तो बेजोड होते हैं। कभी अपने खाने का स्वाद बदलकर तो देखो।' दूसरे चकोर के उड़ने के बाद वह चकोर सोच में पड गया। उसने फैसला किया कि कल ही वह दूर नजर आने वाले खेतों की ओर जाएगा और उस अनाज नाम की चीज़ का स्वाद चखकर देखेग। दूसरे दिन चकोर उड़कर एक खेत के पास उतरा। खेत में धान की फसल उगी थी। चकोर ने कोंपलें खाई। उसे वह अति स्वादिष्ट लगीं। उस दिन के भोजन में उसे इतना आनंद आया कि खाकर तृप्त होकर वहीं आँखें मूंदकर सो गया। इसके बाद भी वह वहीं पडा रहा। रोज खाता-पीता और सो जाता। छः - सात दिन बाद उसे सुध आई कि घर लौटना चाहिए। इस बीच एक खरगोश घर की तलाश में घूम रहा था। उस इलाके में ज़मीन के नीचे पानी भरने के कारण उसका बिल नष्ट हो गया था। वह उसी चकोर वाले पेड के पास आया और उसे ख़ाली पाकर उसने उस पर अधिकार जमा लिया और वहाँ रहने लगा। जब चकोर वापस लौटा तो उसने पाया कि उसके घर पर तो किसी और का क़ब्ज़ा हो गया हैं। चकोर क्रोधित होकर बोला - 'ऐ भाई, तू कौन हैं और मेरे घर में क्या कर रहा हैं?' खरगोश ने दांत दिखाकर कहा - 'मैं इस घर का मालिक हूँ। मैं सात दिन से यहाँ रह रहा हूं, यह घर मेरा हैं।' चकोर गुस्से से फट पडा - 'सात दिन! भाई, मैं इस खोह में कई वर्षो से रह रहा हूं। किसी भी आस-पास के पंछी या चौपाए से पूछ ले।' खरगोश चकोर की बात काटता हुआ बोला- 'सीधी-सी बात हैं। मैं यहाँ आया। यह खोह ख़ाली पडी थी और मैं यहाँ बस गया मैं क्यों अब पडोसियों से पूछता फिरुँ?' चकोर गुस्से में बोला- 'वाह! कोई घर ख़ाली मिले तो इसका यह मतलब हुआ कि उसमें कोई नहीं रहता? मैं आखिरी बार कह रहा हूँ कि शराफत से मेरा घर ख़ाली कर दे वर्ना…।' आगे की कहानी ऑडियो की मदद से जानिए...

बुधवार, 15 जून 2016

असम का हिंदुत्व अन्य राज्यों के हिंदुत्व से अलग

डॉ. महेश परिमल

देश के पूर्वोत्तर में पहली बार भगवा फहराया है। भाजपा खेमे में खुशियां मनाई जा रही हैं। अब पार्टी को यह नहीं सोचना है कि उनका काम खत्म हो गया। बल्कि उनका काम तो अब शुरू हुआ है। असम में भगवा फहराना बड़ी बात नहीं है, बल्कि भगवा फहरता रहे, यह बड़ी बात होगी। भाजपा की असली चुनौती तो अब शुरू हुई है। यह सोचना भूल होगी कि यहां भी हिंदुत्व का नारा लगातार वैतरणी पार कर ली जाएगी। असम का हिंदुत्व देश के अन्य राज्यों के हिंदुत्व से बिलकुल ही अलग है। इसलिए असम को हिंदुत्व की नई प्रयोगशाला बनानी होगी। यहां भाजपा सोच को एक नई दिशा देनी होगी। जैसे अन्य राज्यों में धर्म के मामले को चतुराई से सुलझा लिया जाता है, वैसा यहां नहीं हो सकता। इसलिए भाजपा ने भले ही असम पर फतह कर ली हो, पर अभी भी कई चुनौतियां इंतजार में हैं।
 यह सच है कि भाजपा ने असम पर विजय हिंदुत्व के बल पर ही पाई है। पर असम का हिंदुत्व भारत के अन्य राज्यों से बिलकुल ही अलग है। गुजरात और राजस्थान में हिंदुत्व का मोटा अर्थ गोहत्या बंद कहा जाता है। बिहार और उत्तरप्रदेश में राम मंदिर के मुद्दे पर हिंदुओं को उत्तेजित किया जा सकता है। असम के हिंदू आज भी भोजन में गोमांस का सेवन करते हैँ। उनके लिए गोमांस का मुद्दा नकारा है। वहां के हिदुओं को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की बात करें, तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। उनके लिए तो वे बंगला देशी ही जीवन-मरण का प्रश्न हैं, जिनके कारण उनका जीना ही मुहाल हो गया है। भाजपा ने वहां के लोगों को यह आश्वासन दिया है कि वह घुसपैठियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी। इन घुसपैठियों के कारण भविष्य में वहां के मूल निवासी अल्पसंख्यक हो सकते हैं। इस समस्या के हल का वचन भाजपा ने दिया है, इसलिए वह सत्ता पर काबिज हो पाई है। अब यदि भाजपा इस समस्या का हल प्राथमिकता के साथ नहीं करती, तो असमवासियों के पास पछताने के सिवाय और कोई चारा नहीं है। इसलिए भाजपा यदि अपने वादे पर अमल करती है, तो उसे चुन-चुनकर एक-एक बंगलादेशी को वापस उनके देश भेजना होगा। तभी वह अपने मतदाताओं के विश्वास पर खरी उतरेगी। इन्हीं घुसपैठियों के कारण असम का वातावरण रह-रहकर दूषित हो रहा है। यह अब ओर दूषित न हो, इसके लिए सारे प्रयास भाजपा को ही करने होंगे।
असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल अभी 5 साल पहले तक असम गण परिषद में थे, वे पार्टी छोड़कर भाजपा में आए हैं। वे संघ परिवार की कट्‌टर हिंदू विचारधारा में नहीं पले-बढ़े हैं। पर बंगलादेशी घुसपैठियों को लेकर वे शुरू से ही सख्त हैं। इस विषय पर उनके विचार काफी तीव्र और आक्रामक हैं। 1983 में जब इंदिरा गांधी ने इल्लिगल माइग्रेंट सडिटरमिनेशन बाय ट्रिब्यूनल एक्ट नामक विवादास्पद कानून बनाया था। इसके अनुसार 1951 से लेकर 1971 तक जो भी बंगलादेशी भारत आए हैं, उनके भारत की नागरिकता मिल जाएगी। सर्वानंद जब असम गण परिषद में थे, तब वे उक्त विवादास्पद कानून के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट पहुंच गए। वहां उन्होंने पिटीशन लगाई, अंतत: इस कानून को रद्द करवाने में सफलता पाई। यही कारण है कि असम के लोग उन्हें देवता की तरह पूजते हैं। उन्हें महानायक मानते हैं। भाजपा ने चुनाव प्रचार के दौरान यह कहा भी था कि वह यदि सत्ता पर आती है, तो 1951 से लेकर 1971 तक जितने भी बंगलादेशी असम के तमाम स्थानों पर बस गए हैं, उनके दिया जाने वाला मताधिकार रद्द किया जाएगा। अब वही वचन पूरा करने का समय आ गया है।
पिछले दो दशकों में भाजपा ने असम में स्वयं को शक्तिशाली बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। यह नहीं भूलना चाहिए कि वहां संघ परिवार की शाखाएं अभी नहीं, बल्कि 1946 से चल  रही हैं। असम के कोने-कोने में संघ की शाखाएं फैल गई हैं। 1946 के बाद भारत का विभाजन, फिर 1950 में भूकम्प के बाद इसी संघ परिवार ने वहां खूब काम किया। इससे संघ का प्रभाव बढ़ा। संघ परिवार के लिए बंगलादेश से आए घुसपैठिओं का मतलब वहां के मुस्लिमों तक ही था। बंगलादेश से जो हिंदू रोजी-रोटी की तलाश में असम में आते, वे संघ परिवार की नजर में घुसपैठिए नहीं, पर निराश्रित थे। उन्हें आसरा और नौकरी देने के लिए संघ परिवार हमेशा तैयार रहता। असम के लोगों की नजर में वे घुसपैठिए न तो हिंदू थे और न ही मुस्लिम। उनकी नजर में वे लोग बाहर के आदमी थे। पश्चिम बंगाल के शिक्षित हिंदू भी असम आते, तो असम के लोग स्वयं को असुरक्षित समझने लगते। उन्हें यह डर सताने लगता कि अब सरकारी नौकरियों में हमारे लिए अवसर कम हो जाएंगे। हमारा लाभ इन्हें मिलने लगेगा। संघ परिवार ने लगातार परिश्रम कर असम के मूल हिंदुओं को पश्चिम बंगाल और बंगला देश से आने वाले हिंदुओं के लिए सहिष्णुता का वातावरण बनाया था।
2016 के चुनाव में बंगलादेश से आने वाले मुस्लिम आबादी के मामले को मुख्य मुद्दा बनाने में भाजपा को सफलता मिली, इसका कारण बहुत ही सरल था। 1961 में असम की कुल आबादी में हिदुओं का प्रतिशत 69.75 प्रतिशत था और 24.70 प्रतिशत मुस्लिमों का था। 2011 में हिंदू जनसंख्या का प्रतिशत घटकर 61.46 प्रतिशत हो गई और मुस्लिमों का बढ़कर 34.22 प्रतिशत पहुंच गई। इससे असम के मूल निवासियों में यह भय बैठ गया कि अगर सब कुछ ऐसा ही चलता रहा, तो बहुत ही जल्द यहां के हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएंगे। संभव है, उन्हें कश्मीरी पंडितों की तरह अपना असम भी छोड़ना पड़े। इस भय का भाजपा ने इस चुनाव में पूरा फायदा उठाया। असम में संघ परिवार का दूसरा बड़ा मिशन वहां ईसाई मिशनरीज द्वारा आदिवासियों का धर्म परिवर्तन से रोकना है। इसके लिए वहां बहुत से अस्पताल और स्कूलें खोली गईं। इससे लोगों में जागरूकता आने लगी। दूसरी ओर वहां के आदिवासियों द्वारा गोमांस के सेवन पर शंकराचार्य ने आदिवासियों को हिंदू मानने से ही इंकार कर दिया। तत्कालीन सरसंघसंचालकन गोलवलकर ने यह दलील दी थी कि आदिवासी अज्ञानतावश ऐसा कर रहे हैं। इस दलील को मान्य रखते हुए द्वारकापीछ के शंकराचार्य असम के आदिवासियों को हिंदू मानने के लिए राजी हो गए।
असम की जो 34 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, उसमें असम के मुस्लिमों के अलावा बंगाल से आने वाले मुस्लिमों का भी समावेश होता है। बदरुद्दीन अजमल जैसे मुस्लिम नेता उन्हें संगठित करने में सफल रहे हैं। भाजपा यदि मुस्लिम आबादी को लेकर कोई भी कदम उठाती है, तो उसका खुलकर विरोध भी होगा, यह तय है। इसलिए भाजपा के लिए असम पहले भी एक पहेली था, अब भी है। इस पहेली को सुलझाना ही होगा, नहीं तो यह जीत अधूरी मानी जाएगी। आखिर कुछ सोच-समझकर मतदाताओं ने अपना कीमत वोट भाजपा को दिया है। इसलिए भाजपा जीत की खुशी न मनाकर आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए स्वयं को तैयार कर ले, तो ही काफी होगा। कसौटी की इस घड़ी में सर्बानंद सोनावाल के लिए भी मुश्किल काम है। पर लोगों का विश्वास हे कि वे इस समस्या को सुलझाने में कामयाब हो जाएंगे।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 14 जून 2016

पिता के पत्र पुत्री के नाम - 26

फॉसिल' और पुराने खंडहर... लेख के बारे में... राने रेंगनेवाले जानवरों की हड्डियों को खास तौर से याद रखना। सांप, छिपकली, मगर और कछुवे वगैरह जो आज भी मौजूद हैं, रेंगनेवाले जानवर हैं। पुराने जमाने के रेंगनेवाले जानवर भी इसी जाति के थे पर कद में बहुत बड़े थे और उनकी शक्ल में भी फर्क था। तुम्हें उन देव के-से जंतुओं की याद होगी जिन्हें हमने साउथ केन्सिगटन के अजायबघर में देखा था। उनमें से एक तीस या चालीस फुट लंबा था। एक किस्म का मेढक भी था जो आदमी से बड़ा था और एक कछुवा भी उतना ही बड़ा था। उस जमाने में बड़े भारी-भारी चमगादड़ उड़ा करते थे और एक जानवर जिसे इगुआनोडान कहते हैं, खड़ा होने पर वह एक छोटे-से पेड़ के बराबर होता था। तुमने खान से निकले हुए पौधे भी पत्थर की सूरत में देखे थे। चट्टानों में 'फर्न' और पत्तियों और ताड़ों के खूबसूरत निशान थे। रेंगनेवाले जानवरों के पैदा होने के बहुत दिन बाद वे जानवर पैदा हुए जो अपने बच्चों को दूध पिलाते हैं। ज्यादातर जानवर जिन्हें हम देखते हैं, और हम लोग भी, इसी जाति में हैं। पुराने जमाने के दूध पिलानेवाले जानवर हमारे आजकल के बाज जानवरों से बहुत मिलते थे उनका कद अक्सर बहुत बड़ा होता था लेकिन रेंगनेवाले जानवरों के बराबर नहीं। बड़े-बड़े दाँतोंवाले हाथी और बड़े डील-डौल के भालू भी होते थे। तुमने आदमी की हड्डियाँ भी देखी थीं। इन हड्डियों और खोपड़ियों के देखने में भला क्या मजा आता। इससे ज्यादा दिलचस्प वे चकमक के औजार थे जिन्हें शुरू जमाने के लोग काम में लाते थे। आगे की जानकारी ऑडियो के माध्यम से प्राप्त कीजिए...

पंचतंत्र की कहानियाँ - 21 - बहुरुपिया गधा

कहानी का अंश... एक नगर में धोबी था। उसके पास एक गधा था, जिस पर वह कपडे लादकर नदी तट पर ले जाता और धुले कपडे लादकर लौटता। धोबी का परिवार बडा था। सारी कमाई आटे-दाल व चावल में खप जाती। गधे के लिए चारा ख़रीदने के लिए कुछ न बचता। गांव की चरागाह पर गाय-भैंसें चरती। अगर गधा उधर जाता तो चरवाहे डंडों से पीटकर उसे भगा देते। ठीक से चारा न मिलने के कारण गधा बहुत दुर्बल होने लगा। धोबी को भी चिन्ता होने लगी, क्योंकि कमज़ोरी के कारण उसकी चाल इतनी धीमी हो गई थी कि नदी तक पहुंचने में पहले से दुगना समय लगने लगा था। एक दिन नदी किनारे जब धोबी ने कपडे सूखने के लिए बिछा रखे थे तो आंधी आई। कपडे इधर-उधर हवा में उड गए। आंधी थमने पर उसे दूर-दूर तक जाकर कपडे उठाकर लाने पडे। अपने कपडे ढूंढता हुआ वह सरकंडो के बीच घुसा। सरकंडो के बीच उसे एक मरा बाघ नजर आया। धोबी कपडे लेकर लौटा और गट्ठर गधे पर लादने लगा गधा लडखडाया। धोबी ने देखा कि उसका गधा इतना कमज़ोर हो गया हैं कि एक दो दिन बाद बिल्कुल ही बैठ जाएगा। तभी धोबी को एक उपाय सूझा। वह सोचने लगा 'अगर मैं उस बाघ की खाल उतारकर ले आऊं और रात को इस गधे को वह खाल ओढाकर खेतों की ओर भेजूं तो लोग इसे बाघ समझकर डरेंगे। कोई निकट नहीं फटकेगा। गधा खेत चर लिया करेगा।' धोबी ने ऐसा ही किया। दूसरे दिन नदी तट पर कपडे जल्दी धोकर सूखने डाल दिए और फिर वह सरकंडो के बीच जाकर बाघ की खाल उतारने लगा। शाम को लौटते समय वह खाल को कपडों के बीच छिपाकर घर ले आया। रात को जब सब सो गए तो उसने बाघ की खाल गधे को ओढाई। गधा दूर से देखने पर बाघ जैसा ही नजर आने लगा। धोबी संतुष्ट हुआ। फिर उसने गधे को खेतों की ओर खदेड दिया। गधे ने एक खेत में जाकर फसल खाना शुरू किया। रात को खेतों की रखवाली करने वालों ने खेत में बाघ देखा तो वे डरकर भाग खडे हुए। गधे ने भरपेट फसल खाई और रात अंधेरे में ही घर लौट आया। धोबी ने तुरंत खाल उतारकर छिपा ली। अब गधे के मजे आ गए। हर रात धोबी उसे खाल ओढाकर छोड देता। गधा सीधे खेतों में पहुंच जाता और मनपसन्द फसल खाने लगता। गधे को बाघ समझकर सब अपने घरों में दुबककर बैठे रहते। फसलें चर-चरकर गधा मोटा होने लगा। अब वह दुगना भार लेकर चलता। धोबी भी खुश हो गया। आगे की कहानी ऑडियो की मदद से जानिए...

सोमवार, 13 जून 2016

पंचतंत्र की कहानियाँ - 20 - बड़े नाम का चमत्कार

बड़े नाम का चमत्ककार...कहानी का अंश... एक समय की बात है एक वन में हाथियों का एक झुंड रहता था। उस झुंड का सरदार चतुर्दंत नामक एक विशाल, पराक्रमी, गंभीर व समझदार हाथी था। सब उसी की छत्र-छाया में सुख से रहते थे। वह सबकी समस्याएँ सुनता। उनका हल निकालता, छोटे-बडे सबका बराबर ख्याल रखता था। एक बार उस क्षेत्र में भयंकर सूखा पडा। वर्षों पानी नहीं बरसा। सारे ताल-तलैया सूखने लगे। पेड-पौधे कुम्हला गए धरती फट गई, चारों और हाहाकार मच गया। हर प्राणी बूँद-बूँद के लिए तरसता गया। हाथियों ने अपने सरदार से कहा 'सरदार, कोई उपाय सोचिए। हम सब प्यासे मर रहे हैं। हमारे बच्चे तडप रहे हैं।' चतुर्दंत पहले ही सारी समस्या जानता था। सबके दुख समझता था पर उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या उपाय करे। सोचते-सोचते उसे बचपन की एक बात याद आई और चतुर्दंत ने कहा 'मुझे ऐसा याद आता है कि मेरे दादाजी कहते थे, यहाँ से पूर्व दिशा में एक ताल है, जो भूमिगत जल से जुडे होने के कारण कभी नहीं सूखता। हमें वहाँ चलना चाहिए।' सभी को आशा की किरण नजर आई। हाथियों का झुंड चतुर्दंत द्वारा बताई गई दिशा की ओर चल पडा। बिना पानी के दिन की गर्मी में सफर करना कठिन था, अतः हाथी रात को सफर करते। पाँच रात्रि के बाद वे उस अनोखे ताल तक पहुँच गए। सचमुच ताल पानी से भरा था सारे हाथियों ने खूब पानी पिया जी भरकर ताल में नहाए व डुबकियाँ लगाईं। उसी क्षेत्र में खरगोशों की घनी आबादी थी। उनकी शामत आ गई। सैकडों खरगोश हाथियों के पैरों-तले कुचले गए। उनके बिल रौंदे गए। उनमें हाहाकार मच गया। बचे-कुचे खरगोशों ने एक आपातकालीन सभा की। एक खरगोश बोला 'हमें यहाँ से भागना चाहिए।' एक तेज स्वभाव वाला खरगोश भागने के हक में नहीं था। उसने कहा 'हमें अक्ल से काम लेना चाहिए। हाथी अंधविश्वासी होते हैं। हम उन्हें कहेंगे कि हम चंद्रवंशी है। तुम्हारे द्वारा किए खरगोश सँहार से हमारे देव चंद्रमा रुष्ट हैं। यदि तुम यहां से नहीं गए तो चंद्रदेव तुम्हें विनाश का श्राप देंगे।' एक अन्य खरगोश ने उसका समर्थन किया 'चतुर ठीक कहता है। उसकी बात हमें माननी चाहिए। लंबकर्ण खरगोश को हम अपना दूत बनाकर चतुर्दंत के पास भेजेंगे।' इस प्रस्ताव पर सब सहमत हो गए। लंबकर्ण एक बहुत चतुर खरगोश था। सारे खरगोश समाज में उसकी चतुराई की धाक थी। बातें बनाना भी उसे खूब आता था। बात से बात निकालते जाने में उसका जवाब नहीं था। जब खरगोशों ने उसे दूत बनकर जाने के लिए कहा तो वह तुरंत तैयार हो गया। खरगोशों पर आए संकट को दूर करके उसे प्रसन्नता ही होगी। लंबकर्ण खरगोश चतुर्दंत के पास पहुँचा और दूर से ही एक चट्टान पर चढकर बोला 'गजनायक चतुर्दंत, मैं लंबकर्ण चन्द्रमा का दूत उनका संदेश लेकर आया हूं। चन्द्रमा हमारे स्वामी हैं।' आगे की कहानी ऑडियो की मदद से जानिए...

पिता के पत्र पुत्री के नाम - 25

पीछे की तरफ एक नजर... लेख के बारे में... तुम मेरी चिट्ठियों से ऊब गई होगी! जरा दम लेना चाहती होगी। खैर, कुछ अरसे तक मैं तुम्हें नई बात न लिखूँगा। हमने थोड़े-से खतों में हजारों लाखों बरसों की दौड़ लगा डाली है। मैं चाहता हूँ कि जो कुछ हम देख आए हैं उस पर तुम जरा गौर करो। हम उस जमाने से चले थे जब जमीन सूरज ही का एक हिस्सा थी, तब वह उससे अलग हो कर धीरे-धीरे ठंडी हो गई। उसके बाद चाँद ने उछाल मारी और जमीन से निकल भागा, मुद्दतों तक यहाँ कोई जानवर न था। तब लाखों, करोड़ों बरसों में, धीरे-धीरे जानदारों की पैदाइश हुई। दस लाख बरसों की मुद्दत कितनी होती है, इसका तुम्हें कुछ अंदाजा होता है? इतनी बड़ी मुद्दत का अंदाजा करना निहायत मुश्किल है। तुम अभी कुल दस बरस की हो और कितनी बड़ी हो गई हो! खासी कुमारी हो गई हो। तुम्हारे लिए सौ साल ही बहुत हैं। फिर कहाँ हजार, और कहाँ लाख जिसमें सौ हजार होते हैं। हमारा छोटा-सा सिर इसका ठीक अंदाजा कर ही नहीं सकता। लेकिन हम अपने आपको बहुत बड़ा समझते हैं और जरा-जरा-सी बातों पर झुँझला उठते हैं, और घबरा जाते हैं। लेकिन दुनिया के इस पुराने इतिहास में इन छोटी-छोटी बातों की हकीकत ही क्या? इतिहास के इन अपार युगों का हाल पढ़ने और उन पर विचार करने से हमारी आँखें खुल जाएँगी और हम छोटी-छोटी बातों से परेशान न होंगे। जरा उन बेशुमार युगों का खयाल करो जब किसी जानदार का नाम तक न था। फिर उस लंबे जमाने की सोचो जब सिर्फ समुद्र के जंतु ही थे। दुनिया में कहीं आदमी का पता नहीं है। जानवर पैदा होते हैं और लाखों साल तक बेखटके इधर-उधर कुलेलें किया करते हैं। कोई आदमी नहीं है जो उनका शिकार कर सके। और अंत में जब आदमी पैदा भी होता है तो बिल्कुल बित्ता भर का, नन्हा-सा, सब जानवरों से कमज़ोर! धीरे-धीरे हजारों बरसों में वह ज्यादा मजबूत और होशियार हो जाता है, यहाँ तक कि वह दुनिया के जानवरों का मालिक हो जाता है। और दूसरे जानवर उसके ताबेदार और गुलाम हो जाते हैं और उसके इशारे पर चलने लगते हैं। आगे की जानकारी ऑडियो के माध्यम से प्राप्त कीजिए...

शुक्रवार, 10 जून 2016

एन. रघुरामन - जीने की कला - 10

दिव्यदृष्टि के श्रव्यसंसार में हम लेकर आए हैं, एन. रघुरामन के माध्यम से जीने की कला। अगर आप स्वयं को अपने शहर और देश का अच्छा नागरिक कहते हैं, तो खामोश मत रहिए। आपको अच्छे कामों के लिए आवाज उठानी होगी। तब आपको यह हक मिलेगा कि खुद को अच्छा इंसान होने का तमगा दे सकें क्योंकि अच्छे लोग चुप नहीं रहते हैं, जो करना उचित है, कर डालते हैं। लेख का कुछ अंश… भगवान राम को जटायु के माध्यम से पता चला था कि रावण, सीता का अपहरण कर अपने साथ ले गया है। जटायु ने रावण से संघर्ष किया था और लहूलुहान हो गए थे। जटायु ने ही यह बताया था कि रावण किस दिशा में गया है। जटायु पवित्र आत्मा थे, यह मानकर चुप नहीं रह गए कि ये राम और रावण के बीच का मामला है। उन्होंने भी अपनी तरफ से इस संकट से उबरने का प्रयास किया। भले ही उन्हें सफलता नहीं मिली। दूसरी तरफ महाभारत का वह प्रसंग है, जिसमें दुर्योधन और दुशासन अकेले ही द्रौपदी के अपमान के लिए जिम्मेदार नहीं थे। इसके लिए भीष्म् पितामह, आचार्य द्रोणाचाय्र, महाराज धृतराष्ट्र जैसे अच्छे लोग भी जिम्म्दार थे, जो वहाँ मौजूद थे लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा और न ही उन्हें रोका। अत: उचित और अनुचित का निर्णय अपने विवेक और बुद्धि से लेना चाहिए और फिर उस कार्य को पूरा करने का प्रयास करने में विलंब नहीं करना चाहिए। जीवन में सफलता का यह मंत्र ऑडियो की मदद से जानिए..

पंचतंत्र की कहानियाँ - 19 - बगुला भगत

बगुला भगत... कहानी का अंश... एक वन प्रदेश में एक बहुत बडा तालाब था। हर प्रकार के जीवों के लिए उसमें भोजन सामग्री होने के कारण वहाँ नाना प्रकार के जीव, पक्षी, मछलियाँ, कछुए और केकडे आदि वास करते थे। पास में ही बगुला रहता था, जिसे परिश्रम करना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। उसकी आँखें भी कुछ कमज़ोर थीं। मछलियाँ पकडने के लिए तो मेहनत करनी पडती हैं, जो उसे खलती थी। इसलिए आलस्य के मारे वह प्रायः भूखा ही रहता। एक टांग पर खडा यही सोचता रहता कि क्या उपाय किया जाए कि बिना हाथ-पैर हिलाए रोज भोजन मिले। एक दिन उसे एक उपाय सूझा तो वह उसे आजमाने बैठ गया। बगुला तालाब के किनारे खडा हो गया और लगा आँखों से आँसू बहाने। एक केकडे ने उसे आँसू बहाते देखा तो वह उसके निकट आया और पूछने लगा 'मामा, क्या बात है भोजन के लिए मछलियों का शिकार करने की बजाय खडे आँसू बहा रहे हो?' बगुले ने ज़ोर की हिचकी ली और भर्राए गले से बोला 'बेटे, बहुत कर लिया मछलियों का शिकार। अब मैं यह पाप कार्य और नहीं करुँगा। मेरी आत्मा जाग उठी हैं। इसलिए मैं निकट आई मछलियों को भी नहीं पकड रहा हूं। तुम तो देख ही रहे हो।' केकडा बोला 'मामा, शिकार नहीं करोगे, कुछ खाओगे नहीं तो मर नहीं जाओगे?' बगुले ने एक और हिचकी ली 'ऐसे जीवन का नष्ट होना ही अच्छा है बेटे, वैसे भी हम सबको जल्दी मरना ही है। मुझे ज्ञात हुआ है कि शीघ्र ही यहां बारह वर्ष लंबा सूखा पडेगा।' बगुले ने केकडे को बताया कि यह बात उसे एक त्रिकालदर्शी महात्मा ने बताई हैं, जिसकी भविष्यवाणी कभी ग़लत नहीं होती। केकडे ने जाकर सबको बताया कि कैसे बगुले ने बलिदान व भक्ति का मार्ग अपना लिया है और सूखा पडने वाला है। उस तालाब के सारे जीव मछलियाँ, कछुए, केकडे, बत्तखें व सारस आदि दौडे-दौडे बगुले के पास आए और बोले 'भगत मामा, अब तुम ही हमें कोई बचाव का रास्ता बताओ। अपनी अक्ल लडाओ तुम तो महाज्ञानी बन ही गए हो।' आगे की कहानी ऑडियो की मदद से जानिए...

पिता के पत्र पुत्री के नाम - 24

राजा, मंदिर और पुजारी... लेख के बारे में... हमने पिछले खत में लिखा था कि आदमियों के पाँच दरजे बन गए। सबसे बड़ी जमात मजदूर और किसानों की थी। किसान जमीन जोतते थे और खाने की चीजें पैदा करते थे। अगर किसान या और लोग जमीन न जोतते और खेती न होती तो अनाज पैदा ही न होता, या होता तो बहुत कम। इसलिए किसानों का दरजा बहुत जरूरी था। वे न होते तो सब लोग भूखों मर जाते। मजदूर भी खेतों या शहरों में बहुत फायदे के काम करते थे। लेकिन इन अभागों को इतना जरूरी काम करने और हर एक आदमी के काम आने पर भी मुश्किल से गुजारे भर को मिलता था। उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा दूसरों के हाथ पड़ जाता था खासकर राजा और उसके दरजे के दूसरे आदमियों और अमीरों के हाथ। उसकी टोली के दूसरे लोग जिनमें दरबारी भी शामिल थे उन्हें बिल्कुल चूस लेते थे। हम पहले लिख चुके हैं कि राजा और उसके दरबारियों का बहुत दबाव था। शुरू में जब जातियाँ बनीं, तो जमीन किसी एक आदमी की न होती थी, जाति भर की होती थी। लेकिन जब राजा और उसकी टोली के आदमियों की ताकत बढ़ गई तो वे कहने लगे कि जमीन हमारी है। वे जमींदार हो गए और बेचारे किसान जो छाती फाड़ कर खेती-बारी करते थे, एक तरह से महज उनके नौकर हो गए। फल यह हुआ कि किसान खेती करके जो कुछ पैदा करते थे वह बँट जाता था और बड़ा हिस्सा जमींदार के हाथ लगता था। बाज मंदिरों के कब्जे में भी जमीन थी, इसलिए पुजारी भी जमींदार हो गए। मगर ये मंदिर और उनके पुजारी थे कौन। मैं एक खत में लिख चुका हूँ कि शुरू में जंगली आदमियों को ईश्‍वर और मजहब का खयाल इस वजह से पैदा हुआ कि दुनिया की बहुत-सी बातें उनकी समझ में न आती थीं और जिस बात को वे समझ न सकते थे, उससे डरते थे। उन्होंने हर एक चीज को देवता या देवी बना लिया, जैसे नदी, पहाड़, सूरज, पेड़, जानवर और बाज ऐसी चीजें जिन्हें वे देख तो न सकते थे पर कल्पना करते थे, जैसे भूत-प्रेत। वे इन देवताओं से डरते थे, इसलिए उन्हें हमेशा यह खयाल होता था कि वे उन्हें सजा देना चाहते हैं। वे अपने देवताओं को भी अपनी ही तरह क्रोधी और निर्दयी समझते थे और उनका गुस्सा ठंडा करने या उन्हें खुश करने के लिए क़ुरबानियाँ दिया करते थे। आगे की जानकारी ऑडियो की मदद से प्राप्त कीजिए...

बुधवार, 8 जून 2016

बाल कहानी - तीन सहेलियाँ - राहुल श्रीवास्तव

कहानी का अंश…. मिस्टर अलबर्ट मतारा को पसंद नहीं करते थे। उनकी पत्नी सारा भी उनके तरह के ही खयालों की महिला थी। उन दोनों के अलावा घर में दो गोरे-गोरे सुंदर बच्चे जूली और जेंटल थे, वे भी मतारा को पसंद नहीं करते थे। वे सभी मतारा को ऐसे देख रहे थे, जैसे उनके घर में कोई चुडैल आ गई हो। मिस्टर अलबर्ट के मकान में एक बहुत बड़ा कमरा था। प्राय: वह खाली रहता था। कुछ समय पहले उसमें मिस्टर उरग्वे अपने परिवार के साथ रहते थे। उनके जाने के बाद से वह कमरा खाली ही था। मिस्टर अलबर्ट ने मतारा को उस कमरे में बंद कर दिया। मतारा को उनका यह व्यवहार समझ में नहीं आया। इतने बड़े कमरे में खुद को अकेला पाकर वह डरने लगी। उसने अलबर्ट दंपति से कहा भी कि मुझे यहाँ अकेला मत छोड़िए, लेकिन वे बोले - जब भूख लगे तो कमरे का दरवाजा थपथपा देना। हम खाना दे जाएँगे। मतारा उस कमरे में अकेले डरने लगी। मौसम भी ठंडा था। उसने पलंग में बिछी हुई चादर ओढ़ने के लिए उठाई तो उस पर रखी हुई तीन गुडिया गिर पड़ी। अचानक मतारा को लगा कि वे उससे बात कर रही हैं और उससे रोने का कारण पूछ रही है। देखा तो वहाँ उसकी ही उम्र की तीन लड़कियाँ खड़ी थी। कौन थी वो लड़कियाँ और वे मतारा से क्या बात करने लगी? उन्होंने मतारा का डर दूर किया या नहीं? वे कहाँ से आई थी? ये सारी बातें जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

एन. रघुरामन - जीने की कला - 9

दिव्य दृष्टि के श्रव्य संसार में हम लेकर आए हैं एन.रघुरामन की जीने की कला, जिसमें यह बताया गया है कि हमारी कार्य प्रणाली आगामी दस वर्षों में नाटकीय तरीके से बदलनेवाली है और बेहतर है कि आज से ही शुरू किया जाए और इसका सामना करने के लिए हम तैयार हो जाएँ। जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए नवीनता को स्वीकार करना ही होता है। नए का स्वागत एवं पुराने का अनुभव जीवन को एक नई दिशा देता है। तकनीक के इस नए दौर में हमें जुड़ना होगा तभी हम स्वयं के लिए अवसर खोज पाएँगे अन्यथा पीछे रह जाएँगे। हर कहीं प्रतिस्पर्धा का दौर है। समय में बदलाव तेजी से आ रहा है। बदलते समय की आँधी में जो नहीं बहा, उसे पछाड़ खाकर गिरने से कोई नहीं रोक सकता। कुछ ऐसी ही प्रेरणादायक बातें जानते हैं इस ऑडियो के माध्यम से….

एन. रघुरामन - जीने की कला - 8

दिव्य दृष्टि के श्रव्य संसार में हम लेकर आए हैं एन.रघुरामन की जीने की कला, जिसमें यह बताया गया है कि बच्चों को सुलाने के लिए सुनाई जानेवाली कहानियों को बदलना चाहिए। नई कहानियाँ बननी चाहिए और नई खोज की जानी चाहिए ताकि हमारे बच्चे आज की दुनिया की नई जिम्मेदारियाँ लेने के लिए स्वयं को तैयार कर सकें। बच्चे वो कोमल पौधे या कोमल मिट्टी हैं, जिन्हें जैसा चाहें वैसा आकार दिया जा सकता है। अत: उनकी सोच को बदलने का प्रयास कर उन्हें सही मार्गदर्शन दिए जाने की आवश्यकता है। बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क को एक नए साँचे में ढालने की प्रक्रिया से जुडी बातें जानते हैं इस ऑडियो के माध्यम से….

पंचतंत्र की कहानियाँ - 18 - बंदर का कलेजा

कहानी का अंश... एक नदी किनारे हरा-भरा विशाल पेड था। उस पर खूब स्वादिष्ट फल उगे रहते। उसी पेड पर एक बंदर रहता था। बडा मस्त कलंदर। जी भरकर फल खाता, डालियों पर झूलता और कूदता-फाँदता रहता। उस बंदर के जीवन में एक ही कमी थी कि उसका अपना कोई नहीं था। माँ-बाप के बारे में उसे कुछ याद नहीं था न उसके कोई भाई था और न कोई बहन, जिनके साथ वह खेलता। उस क्षेत्र में कोई और बंदर भी नहीं था जिससे वह दोस्ती कर पाता। एक दिन वह एक डाल पर बैठा नदी का नज़ारा देख रहा था कि उसे एक लंबा विशाल जीव उसी पेड की ओर तैरकर आता नजर आया। बंदर ने ऐसा जीव पहले कभी नहीं देखा था। उसने उस विचित्र जीव से पूछा 'अरे भाई, तुम क्या चीज़ हो?' विशाल जीव ने उत्तर दिया 'मैं एक मगरमच्छ हूँ। नदी में इस वर्ष मछलियों का अकाल पड गया है। बस, भोजन की तलाश में घूमता-घूमता इधर आ निकला हूँ।' बंदर दिल का अच्छा था। उसने सोचा कि पेड पर इतने फल हैं, इस बेचारे को भी उनका स्वाद चखना चाहिए। उसने एक फल तोडकर मगर की ओर फेंका। मगर ने फल खाया बहुत रसीला और स्वादिष्ट वह फटाफट फल खा गया और आशा से फिर बंदर की ओर देखने लगा। बंदर ने मुस्कराकर और फल फेंके। मगर सारे फल खा गया और अंत में उसने संतोष-भरी डकार ली और पेट थपथपाकर बोला 'धन्यवाद, बंदर भाई। खूब छक गया, अब चलता हूँ।' बंदर ने उसे दूसरे दिन भी आने का न्यौता दे दिया। मगर दूसरे दिन आया। बंदर ने उसे फिर फल खिलाए। इसी प्रकार बंदर और मगर में दोस्ती जमने लगी। मगर रोज आता दोनों फल खाते-खिलाते, गपशप मारते। बंदर तो वैसे भी अकेला रहता था। उसे मगर से दोस्ती करके बहुत प्रसन्नता हुई। उसका अकेलापन दूर हुआ। एक साथी मिला। दो मिलकर मौज-मस्ती करें तो दुगना आनन्द आता है। एक दिन बातों-बातों में पता लगा कि मगर का घर नदी के दूसरे तट पर है, जहाँ उसकी पत्नी भी रहती है। यह जानते ही बंदर ने उलाहन दिया 'मगर भाई, तुमने इतने दिन मुझे भाभीजी के बारे में नहीं बताया मैं अपनी भाभीजी के लिए रसीले फल देता। तुम भी अजीब निकट्टू हो अपना पेट भरते रहे और मेरी भाभी के लिए कभी फल लेकर नहीं गए। उस शाम बंदर ने मगर को जाते समय ढेर सारे फल चुन-चुनकर दिए। अपने घर पहुँचकर मगरमच्छ ने वह फल अपनी पत्नी मगरमच्छनी को दिए। मगरमच्छनी ने वह स्वाद भरे फल खाए और बहुत संतुष्ट हुई। मगर ने उसे अपने मित्र के बारे में बताया। पत्नी को विश्वास न हुआ। वह बोली 'जाओ, मुझे बना रहे हो। बंदर की कभी किसी मगर से दोस्ती हुई हैं?' आगे की कहानी जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

पिता के पत्र पुत्री के नाम - 23

आदमियों के अलग-अलग दरजे... लेख के बारे में... हम यह पहले देख चुके हैं कि पुरानी जातियों के आदमियों ने तरह-तरह के काम करने शुरू किए। काम या पेशे का बँटवारा हो गया। हमने यह भी देखा है कि जाति के सरपंच या सरगना ने अपने परिवार को दूसरों से अलग कर लिया और काम का इंतजाम करने लगा। वह ऊँचे दरजे का आदमी बन बैठा, या यों समझ लो कि उसका परिवार औरों से ऊँचे दरजे में आ गया। इस तरह आदमियों के दो दरजे हो गए। एक इंतजाम करता था, हुक्म देता था और दूसरा असली काम करता था। और यह तो जाहिर है कि इंतजाम करनेवाले दरजे का इख्तियार ज्यादा था और इसके जोर से उन्होंने वह सब चीजें ले लीं जिन पर वह हाथ बढ़ा सके। वे ज्यादा मालदार हो गए और काम करनेवालों की कमाई को दिन-दिन ज्यादा हड़पने लगे। इसी तरह ज्यों-ज्यों काम की बाँट होती गई और दरजे पैदा होते गए। राजा और उसका परिवार तो था ही, उसके दरबारी भी पैदा हो गए। वे मुल्क का इंतजाम करते थे और दुश्मनों से उसकी हिफाजत करते थे। वे आमतौर पर कोई दूसरा काम न करते थे। मंदिरों के पुजारियों और नौकरों का एक दूसरा दरजा था। उस जमाने में इन लोगों का बहुत रोबदाब था और हम उनका जिक्र फिर करेंगे। तीसरा दरजा व्यापारियों का था। ये वे सौदागर लोग थे जो एक मुल्क का माल दूसरे मुल्क में ले जाते थे, माल खरीदते थे और बेचते थे और दुकानें खोलते थे। चौथा दरजा कारीगरों का था, जो हर एक किस्म की चीजें बनाते थे, सूत कातते और कपड़े बुनते थे, मिट्टी के बरतन बनाते थे, पीतल के बरतन गढ़ते थे, सोने और हाथी दाँत की चीजें बनाते थे तथा बहुत-से और काम करते थे। ये लोग अकसर शहरों में या शहरों के नजदीक रहते थे लेकिन बहुत से देहातों में भी बसे हुए थे। सबसे नीचा दरजा उन किसानों और मजदूरों का था जो खेतों में या शहरों में काम करते थे। इस दरजे में सबसे ज्यादा आदमी थे। और सभी दरजों के लोग उन्हीं पर दाँत लगाए रहते थे और उनसे कुछ न कुछ ऐंठते रहते थे। आगे की जानकारी ऑडियो की मदद से प्राप्त कीजिए...

मंगलवार, 7 जून 2016

पंचतंत्र की कहानियाँ - 17 - दुष्ट सर्प

कहानी का अंश... एक जंगल में एक बहुत पुराना बरगद का पेड था। उस पेड पर घोंसला बनाकर एक कौआ-कव्वी का जोडा रहता था। उसी पेड के खोखले तने में कहीं से आकर एक दुष्ट सर्प रहने लगा। हर वर्ष मौसम आने पर कव्वी घोंसले में अंडे देती और दुष्ट सर्प मौक़ा पाकर उनके घोंसले में जाकर अंडे खा जाता। एक बार जब कौआ व कव्वी जल्दी भोजन पाकर शीघ्र ही लौट आए तो उन्होंने उस दुष्ट सर्प को अपने घोंसले में रखे अंडों पर झपटते देखा। अंडे खाकर सर्प चला गया कौए ने कव्वी को ढाढ़स बँधाया 'प्रिये, हिम्मत रखो। अब हमें शत्रु का पता चल गया हैं। कुछ उपाय भी सोच लेंगे।' कौए ने काफ़ी सोचा-विचारा और पहले वाले घोंसले को छोड उससे काफ़ी ऊपर टहनी पर घोंसला बनाया और कव्वी से कहा 'यहां हमारे अंडे सुरक्षित रहेंगे। हमारा घोंसला पेड की चोटी के किनारे है और ऊपर आसमान में चील मंडराती रहती हैं। चील सांप की बैरी है। दुष्ट सर्प यहाँ तक आने का साहस नहीं कर पाएगा।' कौवे की बात मानकर कव्वी ने नए घोंसले में अंडे सुरक्षित रहे और उनमें से बच्चे भी निकल आए। उधर सर्प उनका घोंसला ख़ाली देखकर यह समझा कि कि उसके डर से कौआ-कव्वी शायद वहाँ से चले गए हैं पर दुष्ट सर्प टोह लेता रहता था। उसने देखा कि कौआ-कव्वी उसी पेड़ से उड़ते हैं और लौटते भी वहीं हैं। उसे यह समझते देर नहीं लगी कि उन्होंने नया घोंसला उसी पेड़ पर ऊपर बना रखा हैं। एक दिन सर्प खोह से निकला और उसने कौओं का नया घोंसला खोज लिया। घोंसले में कौआ दंपती के तीन नवजात शिशु थे। दुष्ट सर्प उन्हें एक-एक करके घपाघप निगल गया और अपने खोह में लौटकर डकारें लेने लगा। कौआ व कव्वी लौटे तो घोंसला ख़ाली पाकर सन्न रह गए। घोंसले में हुई टूट-फूट व नन्हें कौओं के कोमल पंख बिखरे देखकर वह सारा माजरा समझ गए। कव्वी की छाती तो दुख से फटने लगी। कव्वी बिलख उठी 'तो क्या हर वर्ष मेरे बच्चे साँप का भोजन बनते रहेंगे?' कौआ बोला 'नहीं! यह माना कि हमारे सामने विकट समस्या है पर यहाँ से भागना ही उसका हल नहीं है। विपत्ति के समय ही मित्र काम आते हैं। हमें लोमडी मित्र से सलाह लेनी चाहिए।' दोनों तुरंत ही लोमडी के पास गए। लोमडी ने अपने मित्रों की दुख भरी कहानी सुनी। उसने कौआ तथा कव्वी के आँसू पोंछे। लोमडी ने काफ़ी सोचने के बाद कहा 'मित्रो! तुम्हें वह पेड़ छोड़कर जाने की जरुरत नहीं हैं। मेरे दिमाग में एक तरकीब आ रही हैं, जिससे उस दुष्टसर्प से छुटकारा पाया जा सकता है। लोमडी ने अपने चतुर दिमाग में आई तरकीब बताई। लोमडी की तरकीब सुनकर कौआ-कव्वी खुशी से उछल पडें। उन्होंने लोमडी को धन्यवाद दिया और अपने घर लौट आए। आगे की कहानी जानने के लिए ऑडियो की सहायता लीजिए...

पिता के पत्र पुत्री के नाम - 22

भाषा, लिखावट और गिनती... लेख के बारे में... हम तरह-तरह की भाषाओं का पहले ही जिक्र कर चुके हैं और दिखा चुके हैं कि उनका आपस में क्या नाता है। आज हम यह विचार करेंगे कि लोगों ने बोलना क्यों सीखा। हमें मालूम है कि जानवरों की भी कुछ बोलियाँ होती हैं। लोग कहते हैं कि बंदरों में थोड़ी-सी मामूली चीजों के लिए शब्द या बोलियॉं मौजूद हैं। तुमने बाज जानवरों की अजीब आवाजें भी सुनी होंगी जो वे डर जाने पर और अपने भाई- बंदों को किसी खतरे की खबर देने के लिए मुँह से निकालते हैं। शायद इसी तरह आदमियों में भी भाषा की शुरुआत हुई। शुरू में बहुत सीधी-सादी आवाजें रही होंगी। जब वे किसी चीज को देख कर डर जाते होंगे और दूसरों को उसकी खबर देना चाहते होंगे तो वे खास तरह की आवाज निकालते होंगे। शायद इसके बाद मजदूरों की बोलियॉं शुरू हुईं। जब बहुत-से आदमियों को कोई चीज खींचते या कोई भारी बोझ उठाते नहीं देखा है? ऐसा मालूम होता है कि एक साथ हाँक लगाने से उन्हें कुछ सहारा मिलता है। यही बोलियॉं पहले-पहल आदमी के मुँह से निकली होंगी। धीरे-धीरे और शब्द बनते गए होंगे जैसे पानी, आग, घोड़ा, भालू। पहले शायद सिर्फ नाम ही थे, क्रियाएँ न थीं। अगर कोई आदमी यह कहना चाहता होगा कि मैंने भालू देखा है तो वह एक शब्द ''भालू'' कहता होगा और बच्चों की तरह भालू की तरफ इशारा करता होगा। उस वक्त लोगों में बहुत कम बातचीत होती होगी। धीरे-धीरे भाषा तरक्‍की करने लगी। पहले छोटे-छोटे वाक्य पैदा हुए, फिर बड़े-बड़े। किसी जमाने में भी शायद सभी जातियों की एक ही भाषा न थी। लेकिन कोई जमाना ऐसा जरूर था जब बहुत सी तरह-तरह की भाषाएँ न थीं। मैं तुमसे कह चुका हूँ कि तब थोड़ी-सी भाषाएँ थीं। मगर बाद को, उन्हीं में से हर एक की कई-कई शाखाएँ पैदा हो गई। सभ्यता शुरू होने के जमाने तक, जिसका हम जिक्र कर रहे हैं भाषा ने बहुत तरक्‍की कर ली थी। बहुत-से गीत बन गए थे और भाट व गवैये उन्हें गाते थे। उस जमाने में न लिखने का बहुत रिवाज था और न बहुत किताबें थीं। इसलिए लोगों को अब से कहीं ज्यादा बातें याद रखनी पड़ती थीं। तुकबंदियों और छंदों को याद रखना जयादा सहल है। यही सबब है कि उन मुल्कों में जहाँ पुराने जमाने में सभ्यता फैली हुई थी, तुकबंदियों और लड़ाई के गीतों का बहुत रिवाज था। आगे की जानकारी ऑडियो की मदद से प्राप्त कीजिए...

सोमवार, 6 जून 2016

कहानी - कोल्हू का बैल

कहानी का अंश.... रामापुर के एक धनी व्यक्ति प्रताप का एक पुत्र था कमल। बचपन से ही वह अपने मामा के यहाँ शहर में जाकर पढ़ता था। प्रताप अपने पुत्र को बहुत स्नेह करता था। यही कारण था कि वह उसकी पढ़ाई के लिए पैसे भिजवाने में कोई कमी नहीं करता था। परिणाम यह हुआ कि कमल बुरे व्यसन में पड़ गया। वह पढ़ाई केवल नाम मात्र की ही करके गाँव वापस आ गया। यहाँ आकर शेखी बघारने में लग गया। हर किसी से बातें करने में उसकी कन्नी काटने का प्रयास करता। परंतु एक दिन उसे इसका फल मिल गया। उसे अपने किए पर पछतावा हुआ और उसने अपना स्वभाव बदलने का निर्णय लिया। उसमें यह बदलाव कैसे आया? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए ...

कविताएँ - मनोज कुमार ‘शिव’

कविता का अंश... समय का पंछी उड़ता जाता एक जगह नहीं थम पाता मानव इसका पीछा करता भिन्न –भिन्न राहों पर चलता... पाप – पुण्य पोटली में भरता निज भाग्य निर्धारित करता प्रीत न किसी से ये है लगाता द्वेष न किसी के प्रति पालता बस उड़ता ....उड़ता ही जाता... अनेकों है निज रंग दिखाता हंसाता, रुलाता, प्रिय बनाता सीख सिखाता, अनुभव लाता परिपक्व बनाता, नित्य गाता पर लगाव न कभी दिखाता... निर्मोही बन आगे बढ़ जाता विदाई का पैगाम भी सुनाता सब यहीं का धरा रह जाता समय का पंछी आगे उड़ जाता... ऐसी ही अन्य कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

कहानी - रोशनी बुझे दीये की - भूपेन्द्र कुमार दवे

कहानी का अंश... ट्रेन स्टेशन छोड़ रही थी और मैं अपने डिब्बे की ओर लपका। क्रोध आने पर साँसें उतनी नहीं फूलती, जितनी क्रोध पर काबू पाने के लिये अंतः में उठी बेचैनी से फूलती हैं। मैं धम्म से सीट पर बैठ गया। ‘इतना क्रोध भी अच्छा नहीं होता,’ मेरे बाजू में बैठे हुए व्यक्ति ने कहा। वह शायद उसी जगह मौजूद था जहाँ मैं चीखा था --- ‘अंधी है क्या? दिखता नहीं क्या?’ मैं कुछ कहता, उसके पहले वह कहने लगा, ‘आप उस अपाहिज बच्चे की मदद कर रहे थे। अच्छा काम करते समय तो मन ईश्वर द्वारा संचालित होता है। तब क्रोध तो उठना ही नहीं चाहिये। खैर, अब वह सब भूल जाईये।’ मैंने कहा, ‘मुझे अपने से ज्यादा उस बच्चे की फिक्र थी। दिव्यांग बच्चों के विद्यालय के संचालक की हैसीयत से उनकी सारी जिम्मेदारी मुझ पर ही तो है। यह सुन उस व्यक्ति ने गहरी साँस लेते हुए कहा, ‘जिम्मेदारियाँ तो जिन्दगी भर एक के बाद एक आती ही जाती हैं। उनका थम जाना जिन्दगी को नीरस बना देता है। परन्तु कुछ जिम्मेदारियाँ बड़ी विचित्र-सी होती हैं --- न तो वह निभायी जाती है और जब तक वह पूरी नहीं होती तो चुभती ही जाती हैं --- जिन्दगी का हर क्षण को भारी बनाती हुई।’ यह बोलते-बोलते वह भावुक हो उठा। फिर अपने को संयत कर आगे कहने लगा, ‘एक ऐसी ही जिम्मेदारी मुझ त्रस्त करे जा रही है। सोचता हूँ कि आप के पास शायद इसका निदान मिल जावे।’ फिर अचानक उसने प्रश्न किया, ‘क्या आप मदद कर सकेंगे?’ ‘अवश्य, यदि संभव हो सके तो’, मैंने कहा। ‘आप दिव्यांग संस्था से जुड़े हैं, इसलिये सोचता हूँ कि आप अवश्य कुछ कर सकेंगे। बात यह है कि मेरी पत्नी ने बीस बरस पहले एक बच्ची को जन्म दिया था। परन्तु बच्ची के पाँचवे जन्म दिन के बाद अचानक मेरी पत्नी को लगा कि वह आगे अपनी इस बच्ची को सम्हाल नहीं पावेगी और उसने उसे अनाथालय में देने का मन बना लिया। उस समय मैं भी विदेश गया हुआ था। अतः मैंने सहमती दी और पत्नी ने गोद देने के सहमती-पत्र पर हस्ताक्षर भी कर दिये थे।’ अपनी आँखों की नमी को छिपाने के असफल प्रयास करने के बाद उसने अपनी बात पूरी करते हुए कहा, ‘अभी कुछ समय से पत्नी अपनी इस इकलौती संतान के खो जाने से विचलित हो उठी है। मैं भी हर तरह का प्रयास कर उस बच्ची की खोज नहीं कर पाया हूँ।’ आगे की कहानी जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

पंचतंत्र की कहानियाँ - 16 - दुश्मन का स्वार्थ

दुश्मन का स्वार्थ... कहानी का अंश... एक पर्वत के समीप बिल में मंदविष नामक एक बूढा सांप रहता था। अपनी जवानी में वह बडा रौबीला सांप था। जब वह लहराकर चलता तो बिजली-सी कौंध जाती थी पर बुढापा तो बडे-बडों का तेज हर लेता हैं। बुढापे की मार से मंदविष का शरीर कमज़ोर पड गया था। उसके विषदंत हिलने लगे थे और फुफकारते हुए दम फूल जाता था। जो चूहे उसके साए से भी दूर भागते थे, वे अब उसके शरीर को फांदकर उसे चिढाते हुए निकल जाते। पेट भरने के लिए चूहों के भी लाले पड गए थे। मंदविष इसी उधेडबुन में लगा रहता कि किस प्रकार आराम से भोजन का स्थाई प्रबंध किया जाए। एक दिन उसे एक उपाय सूझा और उसे आजमाने के लिए वह दादुर सरोवर के किनारे जा पहुंचा। दादुर सरोवर में मेंढकों की भरमार थी। वहां उन्हीं का राज था। मंदविष वहां इधर-उधर घूमने लगा। तभी उसे एक पत्थर पर मेंढकों का राजा बैठा नजर आया। मंदविष ने उसे नमस्कार किया 'महाराज की जय हो।' मेंढकराज चौंका 'तुम! तुम तो हमारे बैरी हो। मेरी जय का नारा क्यों लगा रहे हो?' मंदविष विनम्र स्वर में बोला 'राजन, वे पुरानी बातें हैं। अब तो मैं आप मेंढकों की सेवा करके पापों को धोना चाहता हूं। श्राप से मुक्ति चाहता हूं। ऐसा ही मेरे नागगुरु का आदेश हैं।' मेंढकराज ने पूछा 'उन्होंने ऐसा विचित्र आदेश क्यों दिया?' मंदविष ने मनगढंत कहानी सुनाई 'राजन्, एक दिन मैं एक उद्यान में घूम रहा था। वहां कुछ मानव बच्चे खेल रहे थे। ग़लती से एक बच्चे का पैर मुझ पर पड गया और बचाव स्वाभववश मैंने उसे काटा और वह बच्चा मर गया। मुझे सपने में भगवान श्रीकृष्ण नजर आए और शाप दिया कि मैं वर्ष समाप्त होते ही पत्थर का हो जाऊंगा। मेरे गुरुदेव ने कहा कि बालक की मृत्यु का कारण बन मैंने कृष्णजी को रुष्ट कर दिया हैं, क्योंकि बालक कॄष्ण का ही रुप होते हैं। बहुत गिडगिडाने पर गुरुजी ने शाप मुक्ति का उपाय बताया। उपाय यह हैं कि मैं वर्ष के अंत तक मेंढकों को पीठ पर बैठाकर सैर कराऊं।' मंदविष की बात सुनकर मेंढकराज चकित रह गया। सांप की पीठ पर सवारी करने का आज तक किस मेंढक को श्रेय प्राप्त हुआ? उसने सोचा कि यह तो एक अनोखा काम होगा। मेंढकराज सरोवर में कूद गया और सारे मेंढकों को इकट्ठा कर मंदविष की बात सुनाई। सभी मेंढक भौंचक्के रह गए। एक बूढा मेंढक बोला 'मेंढक एक सर्प की सवारे करें। यह एक अदभुत बात होगी। हम लोग संसार में सबसे श्रेष्ठ मेंढक माने जाएंगे।' एक सांप की पीठ पर बैठकर सैर करने के लालच ने सभी मेंढकों की अक्ल पर पर्दा डाल दिया था। सभी ने ‘हां’ में ‘हां’ मिलाई। मेंढकराज ने बाहर आकर मंदविष से कहा 'सर्प, हम तुम्हारी सहायता करने के लिए तैयार हैं।' आगे की कहानी जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

पिता के पत्र पुत्री के नाम - 21

समुद्री सफर और व्यापार.... लेख के बारे में... अब हमें दो बड़ी-बड़ी बातों की दिलचस्प शुरुआत का पता चलता है। समुद्री सफर और व्यापार। आजकल की तरह उस जमाने में अच्छे अगिनवोट और जहाज न थे। सबसे पहली नाव किसी दरख्त के तने को खोखला कर बनी होगी। इनके चलने के लिए डंडों से काम लिया जाता था और कभी-कभी हवा के जोर के लिए तिरपाल लगा देते थे। उस जमाने में समुद्र के सफर बहुत दिलचस्प और भयानक रहे होंगे। अरब सागर को एक छोटी-सी किश्ती पर, जो डंडों और पालों से चलती, तय करने का खयाल तो करो। उनमें चलने-फिरने के लिए बहुत कम जगह रहती होगी और हवा का एक हलका-सा झोंका भी उसे तले ऊपर कर देता है। अक्सर वह डूब भी जाती थी। खुले समुद्र में एक छोटी-सी किश्ती पर निकलना बहादुरों ही का काम था। उसमें बड़े-बड़े खतरे थे और उनमें बैठनेवाले आदमियों को महीनों तक जमीन के दर्शन न होते थे। अगर खाना कम पड़ जाता था तो उन्हें बीच समुद्र में कोई चीज न मिल सकती थी, जब तक कि वे किसी मछली या चिड़िया का शिकार न करें। समुद्र खतरों और जोखिम से भरा हुआ था। पुराने जमाने के मुसाफिरों को जो खतरे पेश आते थे उसका बहुत कुछ हाल किताबों में मौजूद है। लेकिन इस जोखिम के होते हुए भी लोग समुद्री सफर करते थे। मुमकिन है कुछ लोग इसलिए सफर करते हों कि उन्हें बहादुरी के काम पसंद थे; लेकिन ज्यादातर लोग सोने और दौलत के लालच से सफर करते थे। वे व्यापार करने जाते थे; माल खरीदते थे और बेचते थे; और धन कमाते थे। व्यापार क्या है? आज तुम बड़ी-बड़ी दुकानें देखती हो और उनमें जा कर अपनी जरूरत की चीज खरीद लेना कितना सहज है। लेकिन क्या तुमने ध्‍यान दिया है कि जो चीजें तुम खरीदती हो वे आती कहाँ से हैं? तुम इलाहाबाद की एक दुकान में एक शाल खरीदती हो। वह कश्मीर से यहाँ तक सारा रास्ता तय करता हुआ आया होगा और ऊन कश्मीर और लद्दाख की पहाड़ियों में भेड़ों की खाल पर पैदा हुआ होगा। दाँत का मंजन जो तुम खरीदती हो शायद जहाज और रेलगाड़ियों पर होता हुआ अमरीका से आया हो। इसी तरह चीन, जापान, पेरिस या लंदन की बनी हुई चीजें भी मिल सकती हैं। विलायती कपड़े के एक छोटे-से टुकड़े को ले लो जो यहाँ बाजार में बिकता है। रुई पहले हिंदुस्तान में पैदा हुई और इंग्लैंड भेजी गई। एक बड़े कारखाने ने इसे खरीदा, साफ किया, उसका सूत बनाया और तब कपड़ा तैयार किया। यह कपड़ा फिर हिंदुस्तान आया और बाजार में बिकने लगा। बाजार में बिकने के पहले इसे लौटा-फेरी में कितने हजार मीलों का सफर करना पड़ा। यह नादानी की बात मालूम होती है कि हिंदुस्तान में पैदा होनेवाली रुई इतनी दूर इंग्लैंड भेजी जाए, वहाँ उसका कपड़ा बने और फिर हिंदुस्तान में आए। इसमें कितना वक्त, रुपया और मेहनत बरबाद हो जाती है। अगर रुई का कपड़ा हिंदुस्तान में ही बने तो वह जरूर ज्यादा सस्ता और अच्छा होगा। तुम जानती हो कि हम विलायती कपड़े नहीं खरीदते। हम खद्दर पहनते हैं क्योंकि जहाँ तक मुमकिन हो अपने मुल्क में पैदा होनेवाली चीजों को खरीदना अक्लमंदी की बात है। हम इसलिए भी खद्दर खरीदते और पहनते हैं कि उससे उन गरीब आदमियों की मदद होती है जो उसे कातते और बुनते हैं। आगे की जानकारी ऑडियो की मदद से प्राप्त कीजिए...

रविवार, 5 जून 2016

सिमट-सिमट जल भरहिं तलाबा - अनुपम मिश्र

आज हर बात की तरह पानी का राजनीति भी चल निकली है। पानी तरल है, इसलिए उसकी राजनीति भी जरूरत से ज्यादा बहने लगी है। देश का ऐसा कोई हिस्सा नहीं है, जिसे प्रकृति उसके लायक पानी न देती हो, लेकिन आज दो घरों, दो गांवों, दो शहरों, दो राज्यों और दो देशों के बीच भी पानी को लेकर एक न एक लड़ाई हर जगह मिलेगी। मौसम विशेषज्ञ बताते हैं कि देश को हर साल मानसून का पानी निश्चित मात्रा में नहीं मिलता, उसमें उतार-चढ़ाव आता रहता है, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि प्रकृति ‘आईएसआई मार्का’ तराजू लेकर पानी बांटने निकलने वाली पनिहारिन नहीं है। तीसरी-चौथी कक्षा से हम सब जलचक्र पढ़ते हैं। अरब सागर से कैसे भाप बनती है, कितनी बड़ी मात्रा में वह ‘नौतपा’ के दिनों में कैसे आती है, कैसे मानसून की हवाएं बादलों को पश्चिम से, पूरब से उठाकर हिमालय तक ला जगह-जगह पानी गिराती हैं, हमारा साधारण किसान भी जानता है। ऐसी बड़ी, दिव्य व्यवस्था में प्रकृति को मानक ढंग से पानी गिराने की परवाह नहीं रहती। फिर भी आप पाएंगे कि एकरूपता बनी रहती है। पानी की राजनीति ने प्रकृति के इस स्वभाव को भूलने की अक्षम्य गलती की है। इसलिए हम प्रकृति से क्षमा नहीं पा सके हैं। हमने विकास की दौड़ में सब जगह एक सी आदतों का संसार रच दिया है, पानी की एक जैसी खर्चीली मांग करने वाली जीवनशैली को आदर्श मान लिया है। अब सबको एक जैसी मात्रा में पानी चाहिए और जब नहीं मिल पाता तो हम सारा दोष प्रकृति पर, नदियों पर थोप देते हैं।

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