अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

12:13 pm
कहानी का अंश... सुजाता बस मूक दर्शक बनी रहती। वैसे भी उसके पास बोलने के लिए था भी क्या? कभी लगता कि डॉक्टर साहब सही हैं, आखिर हर पिता की इच्छा होती है कि उसका बेटा उससे बेहतर करे। अपने बच्चे के भविष्य को लेकर चिंतित होना हर पिता के लिए एक स्वाभाविक बात है। फिर यदि डॉक्टर प्रशांत ऐसा कर रहे हैं, तो यह कोई अनहोनी थोड़े ही है। पीयूष भी कुछ गलत नहीं है। हर एक को अपने भविष्य के बारे में सोचने का पूरा अधिकार है। अब वह बच्चा थोड़े ही है। अपना भला-बुरा खुद सोच सकता है। दुनिया की किस किताब में लिखा है कि पिता डॉक्टर है, तो बेटे को भी डॉक्टर होना चाहिए। पीयूष एक समझदार बच्चा है और अपने कैरियर के प्रति संवेदनशील भी है। उसने अपना कैरियर खुद चुना और देश का जाना-माना पत्रकार बना। अब उसकी बेटी भी अपनी तरह का जीवन चुनना चाहती थी। अपने अनुसार कैरियर बनाना चाहती थी। फिर वही विचारों की लड़ाई दोहराई जा रही थी। बाप-बेटी के बीच मतभेद की दीवार ऊँची हो, उससे पहले सुजाता ने इस दीवार को तोड़ने का फैसला ले लिया। किस तरह टूटी यह दीवार ? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.