अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

4:48 pm
कहानी का अंश...श्यामसिंह विजयपुरी का शासक था। उसका एकमात्र पुत्र जयसिंह उसका वारिस था। अगल-बगल के छोटे-छोटे राज्यों को श्यामसिंह ने अपने राज्य में मिला लिया था और विजयपुरी को विशाल और दृढ़ बना लिया था। उसके पुत्र जयसिंह ने शस्त्रों व राजनीति का अच्छा अध्ययन किया था। श्यामसिंह की हार्दिक इच्छा थी कि उसके बाद उसका पुत्र ही राजा बने और उससे भी अधिक यश प्राप्त करे लेकिन जयसिंह की राज-काज में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह हमेशा खोया-खोया सा रहता था। पिता ने पुत्र की यह हालत देखी तो उसे बहुत चिंता हुई। उसने उसे समझाया भी। उसके सुख और शांति के लिए कई उपाय भी किए मगर उसका राजकाज में मन नहीं लगता था। वह चित्रकारी का शौक रखता था मगर उसे प्रकृति से बहुत अधिक प्यार था। वह अपने पिता की आज्ञा लेकर दूर प्रांतों में जाना चाहता था। राजा क्या करे? उसकी समझ में कुछ नहीं आया। आखिर उसे अपने राज्य की चिंता थी और साथ ही इकलौते पुत्र की भी। अंत में बहुत सोच-विचार करने के बाद उसने एक उपाय खोज ही निकाला जिससे पुत्र का स्वभाव भी बदल गया और उसका राज्य भी शत्रुओं से सुरक्षित हो गया। राजा ने ऐसा क्या उपाय किया? इसे जानने के लिए ऑडियो की सहायता लीजिए....

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.