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3:41 pm
कविता का अंश... वो गरमी की छुट्टियाँ पुकारती हैं मुझे वो बचपन का बेफिक्र समय पुकारता है मुझे। दोपहर में सबके सोते ही चुपके से उठकर घर से बाहर निकलना पकड़े जाने पर टाट की पट्‌टी को गीला करने का बहाना बनाना और दौड़कर आँगन में आ जाना अकेले में खूब झूला झूलना पहाड़े और कविताएँ गुनगुनाना एक-एक कर सभी के जमा होते ही गप्पों का शामियाना सजाना वो बूढ़े नीम पर पड़े झूलों की पेंगे बुलाती हैं मुझे वो गरमी की छुट्टियाँ पुकारती हैं मुझे इस अधूरी कविता को ऑडियो की मदद से पूरा सुनिए...

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