अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

2:18 pm
लेख के बारे में... उत्तराखंड की पावन धरती पर वैसे तो समय-समय पर अनेक वीरांगनाओं ने जन्म लिया है, लेकिन तीलू रौतेली ने छोटी-सी उम्र में जिस वीरता व साहस का परिचय दिया वह बिरले ही दे पाते हैं, इसलिए तो उन्हें गढ़वाल की लक्ष्मीबाई भी कहा जाता है। तीलू एक शरारती लड़की थी, जो अपनी सहेली बेल्लू और देवकी के साथ उछलकूद किया करती थी। उसकी माँ मैनावती कितना ही रोकती-टोकती पर तीलू कहाँ मानने वाली थी? पेड़ पर चढ़कर उसका फल तोड़कर खाना और अपने भाइयों के लिए लाना यह उसका पसंदीदा काम था। उसके भाई भी उसे बहुत प्यार करते थे। तीलू की हर जिद के आगे उन्हें झुकना पड़ता था। दस-बारह साल की तीलू को घोड़े दौड़ाने में बड़ा मजा आता था। कभी -कभी तो वह अपने भाइयों की तलवारोंं को भी चला लेती थी। उसके पिता ने उसके चौदह साल की होने पर एक घोड़ी भी खरीद कर दी साथ ही एक छोटी तलवार भी। आइए एक झलक देखें इस वीरांगना का जीवन ऑडियो के माध्यम से, जिसे ऐतिहासिक झरोखे से हम तक पहुँचाया है, सुलोचना परमार ‘उत्तरांचली’ ने...

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.