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12:19 pm
कविता का अंश...मर चुका है रावण का शरीर स्तब्ध है सारी लंका सुनसान है किले का परकोटा कहीं कोई उत्साह नहीं किसी घर में नहीं जल रहा है दिया विभीषण के घर को छोड़ कर । सागर के किनारे बैठे हैं विजयी राम विभीषण को लंका का राज्य सौंपते हुए ताकि सुबह हो सके उनका राज्याभिषेक बार-बार लक्ष्मण से पूछते हैं अपने सहयोगियों की कुशल-क्षेम चरणों के निकट बैठे हैं हनुमान ! मन में क्षुब्ध हैं लक्ष्मण कि राम क्यों नहीं लेने जाते हैं सीता को अशोक वाटिका से पर कुछ कह नहीं पाते हैं । पूरी कविता का आनंद ऑडियो की मदद से प्राप्त कीजिए...

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