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कविता का अंश... मैं? मैं हूँ एक प्यारी सी धरती कभी परिपूर्णता से तृप्त और कभी प्यासी आकाँक्षाओं में तपती. और तुम? तुम हो एक अंतहीन आसमान संभावनों से भरपूर और ऊंची तुम्हारी उड़ान कभी बरसाते हो अंतहीन स्नेह और कभी….. सिर्फ धूप……ना छांह और ना मेंह. जब जब बरसता है मुझ पर तुम्हारा प्रेम और तुम्हारी कामनाओं का मेंह खिल उठता है मेरा मन और अंकुरित होती है मेरी देह. युगों युगों से मुझ पर हो छाए मुझे अपने गर्वित अंक में समाये सदियों का अटूट हमारा नाता है …लेकिन फिर भी कभी सम्पूर्ण ना हो पाता है. धरती और आसमान….मिलते हैं तो सिर्फ क्षितिज में सदियों से यही होता आया है …और होगा. जितना करीब आऊं तुम्हारा सुखद संपर्क उतना ही ओझल हो जाता है.

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