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5:31 pm
कविता का अंश.... निर्मम कुम्हार की थापी से कितने रूपों में कुटी-पिटी, हर बार बिखेरी गई, किंतु मिट्टी फिर भी तो नहीं मिटी! आशा में निश्छल पल जाए, छलना में पड़ कर छल जाए सूरज दमके तो तप जाए, रजनी ठुमकी तो ढल जाए, यों तो बच्चों की गुडिया सी, भोली मिट्टी की हस्ती क्या आँधी आये तो उड़ जाए, पानी बरसे तो गल जाए! फसलें उगतीं, फसलें कटती लेकिन धरती चिर उर्वर है सौ बार बने सौ बर मिटे लेकिन धरती अविनश्वर है। मिट्टी गल जाती पर उसका विश्वास अमर हो जाता है। आगे की कविता ऑडियो की मदद से सुनिए...

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