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कविता का अंश... याज्ञसेनी, हाँ द्रौपदी हूँ, मैं ! स्त्रियों के जन्म कब चाहे समय ने, सभ्यता ने और पुरुषों ने बस देह ही चाही ! पुत्र की ही चाह तब से आज तक है युद्ध का नायक बनेगा वह ! मृत्यु पर देगा वही अग्नि, तर्पण, दान, सज्जा भी श्राद्ध होंगे पूर्वजों के संकल्प से उसके राज्य का स्वामी बनेगा वह कुछ नहीं बदला ! उद्विग्न थे राजा द्रुपद संग्राम में हारे हुए थे द्रौणाचार्य ने उनको हराकर राज्य आधा ले लिया था वह जानते थे द्रौण भूलेगा नहीं उस वेदना को गुरु-पुत्र था वह, मित्र भी था बालपन में साथ थे वे, दीक्षित हुए थे एक ही दिन ! एक राजा निर्धनों को क्यों करे स्वीकार, यदि उपयोग ही न हो जनहित का दिखावा घोषणा भर ही तो रहा है हर समय में ! पुत्र की इच्छा प्रबल थी यज्ञ में बैठे हुए थे द्रुपद स्वस्तिवन्दन हो रहा था देवताओं का आचार्य थे यज और उपयज धूम्र से महका हुआ था यज्ञ-परिसर मानो नृत्य अग्नि कर रहा था ! इस पूरी कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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