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5:52 pm
कविता का अंश...याज्ञसेनी, हाँ द्रौपदी हूँ, मैं ! स्त्रियों के जन्म तो होते रहे हैं स्त्रियाँ ही जन्म देती हैं उन्हें भी सृष्टि ऐसे ही चली है युग-युगों से ! स्त्रियाँ ही राजमाताएँ, रानियाँ पट-रानियाँ भी और वे ही नगर-वधुएँ एक चुप्पी-सी झलकती है हमारे धर्म में, चिन्तन-व्यवस्था में न्याय क्यों नारी विमुख-सा ही रहा है ? नलयानी मेरा नाम था पिछले जन्म में निषाद कुल सम्राट, नल थे पिता मेरे द्यूत-प्रेमी, जो जंगलों में वनवास जीते थे और मेरी माँ अलौकिक सुंदरी थी, श्वेतवर्णा -- नाम दमयन्ती, देख कर उसको इन्द्र की भी अप्सराएँ मुँह छुपाती थीं शुचिता से भरी वह श्रेष्ठता से पूर्ण थी त्याग की प्रतिमूर्ति थी वह ! नलयानी सुन्दर थी, मुखर थी माप लेना चाहती थी -- हंसिनी-सी प्रेम का उत्ताल सागर, अधखिली-सी कुमुदिनी थी। इस पूरी कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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