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पंचवटी का अंश... हँसने लगे कुसुम कानन के, देख चित्र-सा एक महान, विकच उठीं कलियाँ डालों में, निरख मैथिली की मुस्कान॥ कौन कौन से फूल खिले हैं, उन्हें गिनाने लगा समीर, एक एक कर गुन गुन करके, जुड़ आई भौंरों की भीर॥ नाटक के इस नये दृश्य के, दर्शक थे द्विज लोग वहाँ, करते थे शाखासनस्थ वे, समधुप रस का भोग वहाँ। झट अभिनयारम्भ करने को, कोलाहल भी करते थे, पंचवटी की रंगभूमि को, प्रिय भावों से भरते थे॥ सीता ने भी उस रमणी को, देखा लक्ष्मण को देखा, फिर दोनों के बीच खींच दी, एक अपूर्व हास्य-रेखा। "देवर, तुम कैसे निर्दय हो, घर आये जन का अपमान, किसके पर-नर तुम, उसके जो, चाहे तुमको प्राण-समान? याचक को निराश करने में, हो सकती है लाचारी, किन्तु नहीं आई है आश्रय, लेने को यह सुकुमारी। देने ही आई है तुमको, निज सर्वस्व बिना संकोच, देने में कार्पण्य तुम्हें हो, तो लेने में क्या है सोच?" इस पूरी कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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