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पंचवटी का अंश... "तो क्या मैं विनोद करती हूँ!" बोली उनसे वैदेही, अपने लिए रुक्ष हो तुम क्यों, होकर भी भ्रातृ-स्नेही? आज उर्मिला की चिन्ता यदि, तुम्हें चित्त में होती है, कि "वह विरहिणी बैठी मेरे, लिये निरन्तर रोती है।" "तो मैं कहती हूँ, वह मेरी बहिन न देगी तुमको दोष, तुम्हें सुखी सुनकर पीछे भी, पावेगी सच्चा सन्तोष। प्रिय से स्वयं प्रेम करके ही, हम सब कुछ भर पाती हैं, वे सर्वस्व हमारे भी हैं, यही ध्यान में लाती हैं॥ जो वर-माला लिये, आप ही, तुमको वरने आई हो, अपना तन, मन, धन सब तुमको, अर्पण करने आई हो, मज्जागत लज्जा तजकर भी, तिस पर करे स्वयं प्रस्ताव, कर सकते हो तुम किस मन से, उससे भी ऐसा बर्ताव?" मुसकाये लक्ष्मण, फिर बोले-"किस मन से मैं कहूँ भला? पहले मन भी तो हो मेरे, जिससे सुख-दुख सहूँ भला!" "अच्छा ठहरो" कह सीता ने, करके ग्रीवा-भंग अहा! "अरे, अरे", न सुना लक्ष्मण का, देख उटज की ओर कहा- इस पूरी कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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