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उर्दू के जाने-माने ग़ज़लकार शहरयार का मूल नाम - अख़लाक़ मुहम्मद ख़ान था। इनका जन्म 9 दिसंबर 1929, लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। इनकी मुख्य कृतियाँ इस्मे आज़म, सातवाँ दरे-हिज्र के मौसम, ख़्वाब का दर बंद है, शाम होने वाली है, मिलता रहूँगा ख़्वाब में, सैरे-जहाँ, कहीं कुछ कम है, नींद की किरचें, फ़िक्रो-नज़र, शेअरो-हिकमत आदि हैं। इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, दिल्ली उर्दू पुरस्कार, फ़िराक सम्मान, शरफ़ुद्दीन यहिया मुनीरी इनाम, इक़बाल सम्मान आदि प्राप्त हुए हैं। 13 फरवरी 2012, अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) में इस फ़ानी दुनिया से रूख़सत होनेवाले शहरयार फिल्मी दुनिया में भी अपनी ग़ज़लों से एक अलग पहचान बना चुके हैं और उनकी कुछ ग़ज़लें हमारे अकेलेपन का हिस्सा बनती हैं। यहाँ प्रस्तुत हैं उनकी कुछ ग़ज़लें... ग़ज़ल का अंश... ऐसे हिज्र के मौसम अब कब आते हैं तेरे अलावा याद हमें सब आते हैं जज़्ब करे क्यों रेत हमारे अश्कों को तेरा दामन तर करने अब आते हैं अब वो सफ़र की ताब नहीं बाक़ी वरना हमको बुलावे दश्त से जब-तब आते हैं जागती आँखों से भी देखो दुनिया को ख़्वाबों का क्या है वो हर शब आते हैं काग़ज़ की कश्ती में दरिया पार किया देखो हम को क्या-क्या करतब आते हैं। ऐसी ही अन्य ग़ज़लों का लुत्फ़ उठाइए, ऑडियो के माध्यम से...

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