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कविता का अंश... तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए! मेरे वर्ण-वर्ण विश्रंखल, चरण-चरण भरमाए, गूंज-गूंज कर मिटने वाले मैनें गीत बनाये; कूक हो गई हूक गगन की कोकिल के कंठो पर, तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए! जब-जब जग ने कर फैलाए, मैनें कोष लुटाया, रंक हुआ मैं निज निधि खोकर जगती ने क्या पाया! भेंट न जिसमें मैं कुछ खोऊं, पर तुम सब कुछ पाओ, तुम ले लो, मेरा दान अमर हो जाए! तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए! इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

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