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ईश्वर की खोज... कविता का अंश... मैं ईश्वर खोजने निकला मैंने कई दरवाज़े खटखटाये कई दरवाज़ों की घंटियाँ बजाई कई दरवाज़ों पर मत्था टेका फिर एक दिन मुझे अचानक ईश्वर का दरवाज़ा मिल गया। मैं ईश्वर के दरवाज़े पर खड़ा था, मैं दरवाज़ा खटखटा देता, तो ईश्वर बाहर निकल आता। पर मैं साँस रोके खड़ा रहा मैंने दरवाज़ा नहीं खटखटाया, मैं दरवाज़े से बिना आवाज़ किये वापिस हो लिया मैंने अपने पैर के जूते उतार लिये कहीं जूतों की आहट सुनकर वह बाहर न आ जाये। फिर मैं मज़े से गलियों में दरवाज़े खटखटाता रहा ईश्वर को ज़ोर-ज़ोर से पुकारता रहा सिवाय उस दरवाज़े और उस गली को छोड़कर जिसमें वह रहता था। फिर एक दिन मुझे लगा कि- कहीं वह अपनी गली के दरवाज़े पर आकर खड़ा न हो जाये तो मैंने उस गली की ओर जाना छोड़ दिया मैं दूसरे मोहल्ले में, दूसरी गलियों में ईश्वर को आवाज़ देने लगा। इस कविता को पूरा सुनने के लिए और इसके साथ ही अन्य कविताओं का आनंद लेने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए... सम्पर्क - aniruddhsengar03@gmail.com, sengar.anirudha@yahoo.com

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  1. प्रिय अनिरूद्ध जी, आपकी इस रचना में बहुत दम है. वाकई ये रचना दिल को छू लेने वाली है.
    आनंद आ गया.



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