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चतुर चित्रकार… कहानी का अंश… प्राचीन काल में भारत के मध्यदेश से एक प्रतिभाशाली चित्रकार यवन देश में गया। वहाँ पर एक अनोखा यंत्राचार्य रहता था। उसने चित्रकार को अपने यहाँ ठहराया। अतिथि की सेवा करने के लिए उसने एक यांत्रिक स्त्री को नियुक्त किया। जिसे उस शिल्पी ने स्वयं बनाया था। यह यांत्रिक स्त्री चित्रकार के पैर धोकर जा रही थी। वह देखने में इतनी मानवीय और स्वाभाविक लग रही थी कि उस मूर्ति को देख चित्रकार ने सोचा कि वह सचमुच एक औरत है। वह उससे कुछ बातचीत करना चाहता था। इसलिए उसने उससे कुछ सवाल किए पर बदले में स्त्री ने कोई जवाब नहीं दिया। इस पर चित्रकार ने उस स्त्री का हाथ पकड़कर खींचा। उसके धक्के से मूर्ति के भीतर के जोड़ हिल गए और वह नीचे गिर पड़ी। चित्रकार को यह समझते देर नहीं लगी कि यह एक यांत्रिक स्त्री है। वह यंत्राचार्य की अक्लमंदी पर आश्चर्यचकित रह गया। साथ ही उसे इस बात का दुख भी था कि यंत्राचार्य ने उसे इस रहस्य के बारे में कुछ नहीं बताया। उसने महसूस किया कि उसे यंत्राचार्य ने इस मूर्ति के बारे में कुछ न बताकर उसका अपमान किया है। यह बात उसके मन में खटकने लगी। इस अपमान का प्रतिकार लेने का चित्रकार ने निश्चय किया। आखिर चित्रकार ने किसप्रकार प्रतिकार लिया? यंत्राचार्य ने इस प्रतिकार का क्या प्रत्युत्तर दिया? इन जिज्ञासाओं का समाधान पूरी कहानी के द्वारा ही होगा। तो सुनिए इस अधूरी कहानी को ऑडियो की मदद से…

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