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कन्यादान... कविता का अंश... जाओ, मैं नहीं मानता इसे, क्योंकि मेरी बेटी कोई चीज़ नहीं, जिसको दान में दे दूँ; मैं बांधता हूँ बेटी तुम्हें एक पवित्र बंधन में, पति के साथ मिलकर निभाना तुम, मैं तुम्हें अलविदा नहीं कह रहा, आज से तुम्हारे दो घर, जब जी चाहे आना तुम, जहाँ जा रही हो, खूब प्यार बरसाना तुम, सब को अपना बनाना तुम, इस अधूरी कविता काे पूरी सुनिए ऑडियो की मदद से...

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