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कविता का अंश... मैंने देखा है दूर कहीं पर्बतों के पेड़ों पर शाम जब चुपके से बसेरा कर ले और बकिरयों का झुंड लिए कोई चरवाहा कच्ची-कच्ची पगडंडियों से होकर पहाड़ के नीचे उतरता हो मैंने देखा है जब ढलानों पे साए-से उमड़ने लगें और नीचे घाटी में वो अकेला-सा बरसाती चश्मा छुपते सूरज को छू लेने के लिए भागे हाँ, देखा है ऐसे में और सुना भी है इन गहरी ठंडी वादियों में गूँजता हुआ कहीं पर बाँसुरी का सुर कोई़... तब यूँ ही किसी चोटी पर देवदार के पेड़ के नीचे खड़े-खड़े मैंने दिन को रात में बदलते हुए देखा है! ऐसी ही अन्य कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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