अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

9:53 am
मत कर नयना गीले... कविता का अंश... कुछ यादों सँग जी ले बहना, मत कर नयना गीले। मैं तेरे बचपन का साथी, मैं ही तो था घोड़ा -हाथी। अपनी दुनिया,अपनी बातें, घरवालों से विलग कथा थी, मोल नहीं कुछ दो चुटियों का, हँसकर आँसू पी ले बहना, मत कर नयना गीले। जिस दिन से तू डोली बैठी , अम्मा की मुस्कानें झूठी, माटी का वो एक घरौंदा, बगिया से हरियाली रूठी, बाबा पथराए- से लगते, करके करतल पीले बहना, मत कर नयना गीले। दूर पिया के देश बसी तू, दुनियादारी बीच फ़ँसी तू, राजकुमारी गुड़िया रानी, चारदीवारी बीच कसी तू, ये बतला क्या तुझपर बीती, दाग पड़े क्यों नीले बहना, मत कर नयना गीले। इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.