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11:42 am
कविता का अंश... भुट्टे आये बड़े रसीले, दाने जिनके पीले-पीले,| चूल्हे सिगड़ी गरम गरम हैं , भुट्टे देखो नरम नरम हैं ,| सिंकने पर खुशबु है आती, खाने को यह जी ललचाती,| थोडा नींबू नमक लगाओ, चबा चबा कर इनको खाओ,| दादा जी के दांत नहीं हैं, उनको देखो नहीं सताओ,| दूध भरे यह दाने न्यारे, बारिश में लगते हैं प्यारे,| मोतीसे दाने जड़े हुए हैं, एक कतार में खड़े हुए हैं,| मुंह पर मूंछें रखें सिकन्दर, हरे भरे कपड़ों के अंदर ,| दाने मक्का के पक जाते, पॉप-कॉर्न हम इनके खाते,| इनके कई बनते पकवान, मक्का खूब उगाएं किसान,| इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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