अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

11:48 am
कविता का अंश… गर्मी की छुट्टी लगते ही घर आना बेटे, माना कष्ट गाँव में अनगिन पर आना बेटे। खेड़े वाला आम लदा है खूब कैरियों से, पके खजूर तोड़ने छोरे लड़ें बैरियों से। देख जामुनें लदी पंछियों के मन डोल रहे, फूले-फले करोंदा मन में मिसरी घोल रहे। तरबूजे की रेता में बरात सजी लगती, खरबूजे संग दुबली ककड़ी बहुत भली लगती। द्वार डटा कबीट देखता है रस्ता तेरा, उसकी ममता को तू सस्वर कर जाना बेटे। गर्मी की छुट्टी लगते ही घर आना बेटे, माना कष्ट गाँव में अनगिन पर आना बेटे। पता नहीं यह नदिया किसके बिना उदासी है, पनघट पर खामोशी रहती अच्छी खासी है। पुरखों वाला खेत आजकर बहुत अनमना है, खलिहानों वाला चबूतरा अभी अधबना है। बड़-पीपल दोनों ने लम्बी चुप्पी साधी है, कोयल-मैना की किलकन बस आधी-आधी है। आँगन चौपालों में बंद हुई बोला-चाली, दोनों को तू जल्दी आकर समझाना बेटे। गर्मी की छुट्टी लगते ही घर आना बेटे, माना कष्ट गाँव में अनगिन पर आना बेटे। मुंडी गैया खिरका जाते रोज तंगाती है, कबरी की बछिया घंटो हर रोज रंभाती है। डूंडा बैल रात दिन बेहद गुमसुम रहता है, कैरा की आँखों से हरदम पानी बहता है। भूरी भैंस भरोसे की फिर पड़ी बियानी है, कल्ली के मरने की बेहद करुण कहानी है। नागौरी बैलों की जोड़ी असमय बुढयानी, कैसे खेत जुतेंगे तू ही बतलाना बेटे। गर्मी की छुट्टी लगते ही घर आना बेटे, माना कष्ट गाँव में अनगिन पर आना बेटे। इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.