अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

9:53 am
कविता का अंश... जो आग जला दे भारत की ऊँचाई, वह आग न जलने देना मेरे भाई । तू पूरब का हो या पश्चिम का वासी तेरे दिल में हो काबा या हो काशी तू संसारी हो चाहे हो संन्यासी तू चाहे कुछ भी हो पर भूल नहीं तू सब कुछ पीछे पहले भारतवासी । उन सबकी नज़रें आज हमीं पर ठहरीं जिनके बलिदानों से आज़ादी आई । जो आग जला दे भारत की ऊँचाई, वह आग न जलने देना मेरे भाई । तू महलों में हो या हो मैदानों में तू आसमान में हो या तहखानों में पर तेरा भी हिस्सा है बलिदानों में यदि तुझमें धड़कन नहीं देश के दुख की तो तेरी गिनती होगी हैवानों में । मत भूल कि तेरे ज्ञान सूर्य ने ही तो दुनिया के अँधियारे को राह दिखाई । जो आग जला दे भारत की ऊँचाई, वह आग न जलने देना मेरे भाई । तेरे पुरखों की जादू भरी कहानी गौतम से लेकर गाँधी तक की वाणी गंगा जमना का निर्मल-निर्मल पानी इन सब पर कोई आँच न आने पाए सुन ले खेतों के राजा, घर की रानी । भारत का भाल दिनों-दिन जग में चमके अर्पित है मेरी श्रद्धा और सचाई । जो आग जला दे भारत की ऊँचाई, वह आग न जलने देना मेरे भाई । इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.