अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

3:19 pm
कविता का अंश… काठ के पहिए, काठ की घोड़ी, चार पाँव पर तिरपट दौड़ी। बैठने वाला धक्का दे, साइकिल थी या दुलदुल घोड़ी। हुई लुहार के दिल में खटपट, शक्ल बदल दी उसने झटपट। किए चार से दो पहिए कट, ताकि दौड़े सड़क पर सरपट। मैकमिलन लुहार की अक्कल, दो पहियों से बनी बाइसिकल। पीछे के पहिए पर पैडल, जोड़ दिए थे लगा के एक्सल। पहन पाँव में जूता, सैंडल, चढ़ो, साइकिल, मारो पैडल। धक्के की न रही जरूरत, ऐ बाबू क्यों जाते पैदल? मियां मैक थे बड़े खबीस, दाँत दिखाते थे बत्तीस। जहाँ जाएँ, साइकिल पर जाते, लोग निपोरें चाहे खीस। मैकमिलन का फैला जस, न मोटर थी तब, न बस। सत्तर मील चले साइकिल पर, जिसमें लग गए घंटे दस। इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.