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12:02 pm
कहानी का अंश… एक थी सुनहरी चिड़िया। नदी किनारे उसका घोंसला था। नन्हें-मुन्ने बच्चे थे। बड़ा प्यारा परिवार था उसका। सूरज निकलने से पहले ही सुनहरी चिडिया अपने बच्चों को जगा देती। बच्चे चीं चीं चीं करते हुए अपनी आँखें खोलते और बोलते – नहीं, नहीं हमें अभी और सोने दो। हमें नींद आ रही है। सुनहरी चिड़िया बोलती – देखो सूरज की किरणें कब की आँगन में नाच रही है। खूबसूरत फूलों पर ओस की बूँदें झिलमिला रही हैं। बहुत सारे फूल खिले हैं। वह सब के सब तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं। चलो, चलो अब हम ज्वार के खेत में जाएँगे। ज्वार के दाने चुगेंगे। उठो, उठो जल्दी उठो। लेकिन बच्चे तो आलस करते हुए फिर से आँखें बंद कर सो जाते। चिड़िया को उन पर प्यार भी आता और गुस्सा भी। वह सोचती - देखो कितनी प्यारी सुबह है। लेकिन सुस्ती है कि इनका पीछा ही नहीं छोड़ती है। सोना, सोना और केवल सोना। नींद के अलावा इन्हें कुछ और सूझता ही नहीं है। इनके कारण मैं भी घोंसले में कैद होकर रह गई हूँ। आखिर ऐसा कब तक चलेगा। वह मन ही मन ये बातें सोचती और परेशान हो जाती। नीचे नदी में उसकी प्यारी दोस्त नीली मछली रहती थी। एक दिन नीली मछली ने उससे पूछा – चिड़िया रानी क्या तुम अभी तक सो रही हो? देखो सूरज कितना चढ़ आया है। उसकी बातें सुनकर सुनहरी चिड़िया शर्मिंदा हुई। क्या उसने अपनी परेशानी नीली मछली को बताई? क्या नीली मछली ने उसकी बातों को गंभीरतापूर्वक सुना? क्या उसने अपनी सहेली की मदद की? इन सारी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए इस अधूरी कहानी को पूरा सुनिए ऑडियो की मदद से…

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