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कहानी का अंश… बहुत पुरानी बात है। रामपुर नाम के गाँव में एक आदमी रहता था। उसका नाम था धपोर चंद्र। धपोर चंद्र अपने नाम के अनुरूप ही बहुत आलसी और कामचोर था। इसलिए गाँव के लोग उसे कई बार समझा चुके थे कि आलस त्याग दो और मेहनत करो। काम करने के फायदे जानने के बाद भी वह था कि पत्थर की तरह अपनी आदत से टस से मस न होता था। लोग समझाते-समझाते थक गए और आखिर उन्होंने उसे समझाना ही छोड़ दिया। दिन-रात बैठे-बैठे वह एक ही बात सोचा करता कि काश उसे कहीं से गड़ा हुआ खजाना मिल जाए तो वह उससे एक शानदार महल बनवाता। ढेर सारे नौकर रखता और आराम से रहता। धपोर चंद्र की पत्नी कामिनी अपने पति की आदत से बहुत परेशान थी। बेचारी दिन-रात मेहनत मजदूरी करके अपना, पति का और बच्चो का पेट भरती थी। उसके पास कुछ खेत भी थे लेकिन धपोर चंद्र की कामचोरी के कारण वे बंजर हो चुके थे। एक बार गाँव में अकाल पड़ा। चारों ओर हाहाकार मच गया। लोग भूखों मरने लगे। कामिनी भी बेहद चिंतित हो गई। उसका थोड़ा-बहुत जमा किया हुआ धन भी धीरे-धीरे खतम हो गया। अब वह क्या करे? अपने पति को कैसे समझाए? क्या उसका पति परिस्थितियों से सबक लेगा? क्या उसमें कुछ सुधार आएगा? क्या उसे उसके आलस का फल मिलेगा ? क्या उसमें अपनी पत्नी के प्रति प्रेम या दया की भावना जागेगी? इन सारी बातों को जानने के लिए और आगे की कहानी जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए….

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