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कहानी का अंश… राजस्थान के ब्यावर शहर में वह मूर्ति आज भी है - राजू सिंह की मूर्ति। बस्ती के बीचोबीच स्थापित उस छोटी-सी प्रतिमा को गर्द और गुबार ने ढँक-सा लिया है लेकिन सौ-सवा सौ साल बीत जाने पर भी राजू सिंह की शौर्यगाथा आज भी धूमिल नहीं हुई है। उसकी चमक बढ़ती ही जा रही है। राजू सिंह एक गरीब किसान का बेटा था। पुश्तैनी पेशा था काश्तकारी। उसके पिता डूँगाजी का देहावसान हो चुका था। राजू और उसके दोनों भाई खेती के काम में अपनी माँ पार्वती की मदद किया करते थे। राजू था तो केवल चौदह साल का, लेकिन उसमें हिम्मत गजब की थी। सन 1820 की बात है। अंग्रेजों का खौफ पूरे राजस्थान पर छाया हुआ था। वहाँ के सामंत और राजा भी अंग्रेजों से मिलकर गरीबों पर मनमानी कर रहे थे। पटवारी लगान वसूल करते समय किसानों को कोड़ों से मारते थे। सरकार के छोटे से छोटे कर्मचारी का भी आतंक छाया हुआ था। ब्यावरा तब तहसील थी। कर्नल टॉड वहाँ का प्रशासक था। एक दिन पटवारी तेजसिंह लगान वसूल करने के लिए राजू सिंह के गाँव आया। उन्हें देखकर गाँव वाले डर गए। तेजसिंह ने आते ही किसानों को गालियाँ देनी शुरू कर दी। राजू सिंह को यह अच्छा नहीं लगा। तभी पटवारी तेजसिंह घोड़े से नीचे उतरा और मंदिर के चबूतरे पर जूते पहनकर ही बैठ गया। उसका यह व्यवहार सभी को बहुत बुरा लगा लेकिन उसके सामने कहने की हिम्मत किसी की नहीं थी। राजू सिंह से नहीं रहा गया और उसने तेजसिंह से कहा - यह हमारा मंदिर है। इस पर जूते पहनकर नहीं चढ़ना चाहिए। चलो, नीचे उतरो। वहाँ सन्नाटा छा गया। चौदह साल का एक बालक अंग्रेजो के गुमाश्ते का ऐसा अपमान कर दे, यह तो किसी ने सोचा भी नहीं था। सिपाहियों ने राजू सिंह को पीटना शुरू कर दिया। पटवारी तेज सिंह जोर-जोर से चिल्ला रहा था - मार डालो, मार डालो इस बदमाश को। इसकी हिम्मत कैसे हुई कि यह मुझे नीचे उतरने के लिए कहे। तभी राजू के दोस्त वहाँ पहुँच गए और सिपाहियों से भिड़ गए। गांव वालों की भी हिम्मत बँधी और वे भी सामने आ गए। सभी ने मिलकर पटवारी को मारा। वातावरण बिगड़ता देखकर तेजसिंह वहाँ से चला गया। उसने भाग जाना ही उचित समझा। उन सभी ने राजा की गढ़ी में जाकर पनाह ली। आगे क्या हुआ? राजू सिंह ने तेज सिंह को सबक सिखाया या नहीं? उसने अंग्रेजों के अत्याचार का बदला किस प्रकार लिया? कैसे वह बहादुर बाल शहीद बना? इस रोचक कथा को जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

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