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6:18 pm
कविता का अंश... मैं छाँव छाँव चला था अपना बदन बचा कर के रूह को एक खूबसूरत जिस्म दे दूँ न कोई सिलवट न कोई दाग़ कोई न धुप झुलसे, न चोट खाये न ज़ख्म छुए , न दर्द पहुंचे बस एक कोरी कुंवारी सुबह का जिस्म पहना दूँ रूह को मैं मगर तपी जब दोपहर दर्दों की ,दर्द की धुप से जो गुज़रा तो रूह को छाँव मिल गयी है अजीब है दर्द और तस्की'न का साँझा रिश्ता मिलेगी छाँव तो बस कहीं धुप मैं मिलेगी....!! ऐसी ही अन्य गुलाबी नज्में सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

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