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लेख का अंश… सन् 1857 के विद्रोह की आग भड़क उठी थी। कानपुर और दिल्ली इसके प्रमुख केन्द्र थे। कानपुर की क्रांति का नेतृत्व नाना साहेब पेशवा कर रहे थे। समूचे देश में फिरंगी साम्राज्यवादियों को उखाड़ फेंकने का विचार पनप रहा था। ऐसी ही स्थितियों में नाना साहेब पेशवा क्रांतिकारियों की प्रेरणा बन गए थे। विद्रोहियों की मदद करने के लिए जब उन्हें कानपुर कुछ समय के लिए छोड़ना पड़ा, तो कानपुर की क्रांति की बागडोर उन्होंने अपनी बेटी मैना को सौंप दी। तब मैना मात्र तेरह वर्ष की थी। पेशवा को अपनी बेटी पर पूरा भरोसा था। तात्या टोपे उन दिनों कानपुर में ही मुकाम कर रहे थे। उनके नेतृत्व में अंग्रेजों पर हमला बोला गया। अंग्रेज पराजित हुए। कानपुर पर विप्लावियों का कब्जा हो गया। अंग्रेजों की हार की सूचना जब इलाहाबाद पहुँची, तो बड़ी तादाद में अंग्रेज सैनिक कानपुर पहुँच गए। मैना ने हिम्मत नहीं हारी। उसने अपने सिपाहियों को कई हिस्सों में बाँट दिया। ये क्रांतिकारी शूरवीर थे। उन्होंने अंग्रेजों पर ताबड़तोड़ हमला बोल दिया। काफी तादाद में अंग्रेज सैनिक मारे गए। लगभग आठ सौ फिरंगी बुरी तरह जख्मी भी हुए। इसी बीच इलाहाबाद से जनरल माउंट तीन हजार सैनिकों के साथ कानपुर आ धमका। क्रांतिकारी गंगा के किनारे बड़ी संख्या में एकत्रित थे। वे आततायियों से मुकाबले की तैयारी कर रहे थे कि तभी उन पर जनरल माउंट के सैनिकों ने आक्रमण कर दिया। माउंट का निशाना तात्या टोपे थे। जो कि क्रांतिकारियों का नेतृत्व कर रहे थे। अंग्रेज सैनिकों ने उन्हें घेरना शुरू कर दिया। तात्या टोपे के प्राण संकट में देख उन्हें बचाने का निश्चय किया गया। उनकी रक्षा करना स्वाधीनता संग्राम को आगे बढ़ाने के लिए अनिवार्य था। वे कुशल रणनीतिकार थे और उनके गिरफ्तार हो जाने का अर्थ था आजादी की लड़ाई का तितर-बितर हो जाना। बिजली की सी गति से मैना फिरंगियों पर टूअ पड़ी। उसके हाथ में नंगी तलवार थी। तेरह वर्ष की वह किशोरी साक्षात् रणचंडी बनकर अंग्रेजों का मुकाबला कर रही थी। अपने सामने जब मैना के रूप में स्वयं मृत्युदूत को देखा, तो अंग्रेज पीछे हट गए। तात्याटोपे को अंग्रेजों की गिरफ्तारी से छुटकारा मिल गया। वे उनकी घेराबंदी से दूर निकल गए। आगे क्या हुआ? मैना ने अन्य अंग्रेज सैनिकों का मुकाबला किस प्रकार किया? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

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